Feb 3, 2015

गुमराहकुन है मीडिया रिपोर्ट

मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर में गिरावट 

ऐसी ख़बरें आ रही थीं कि मोदी सरकार 2011 के धार्मिक जनगणना के आंकड़ों को जारी करने की दिशा में गंभीरता से सोच रही है , अंग्रेज़ी अख़बार ' द टाइम्स आफ़ इंडिया ' ने गत 22 जनवरी को  इसकी  स्कूप खबर प्रकाशित कर दी , जिसके अनुसार , देश में मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत 18 प्रतिशत के विपरीत 2001-11 के दौरान 24 प्रतिशत बढ़ी है और इसके साथ कुल आबादी में समुदाय का प्रतिनिधित्व 13.4 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गया है। धार्मिक समूहों की आबादी पर जनगणना के आंकड़ों में कहा गया है कि देश के सभी राज्यों में जम्मू-कश्मीर में सर्वाधिक मुस्लिम आबदी 68.3 प्रतिशत है। इसके बाद असम में 34.2 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने विगत 21 जनवरी को कहा था कि आंकड़े जल्द जारी किए जा सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 1991 से 2001 के बीच मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर करीब 29 प्रतिशत थी | पांच प्रतिशत की आई गिरावट के बावजूद मुस्लिम आबादी में 24 प्रतिशत वृद्धि दर दशक 2001-11 में 18 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। कुल आबादी में मुसलमानों की आबादी सर्वाधिक तेज गति से असम में बढ़ी है। राज्य में 2001 में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का 30.9 प्रतिशत थी और बाद के दशक में यह बढ़कर 34.2 प्रतिशत हो गई है । मणिपुर एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मुसलमानों की आबादी कम होकर 8.8 प्रतिशत से 8.4 प्रतिशत हो गई है। असम और पश्चिम बंगाल एक और ऐसा राज्य है जहां बांग्लादेश से अवैध आव्रजन एक मुद्दा रहा है। इस राज्य में मुसलमानों की आबादी 2001 के आंकड़े 25.2 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 27 प्रतिशत हो गई। यह 1.8 प्रतिशत की वृद्धि है , जो अधिक नहीं कही जा सकती | उत्तराखंड में भी मुस्लिम आबादी में वृद्धि हुई है और यह आंकड़ा 2001-2011 के बीच 11.9 प्रतिशत से बढ़कर 13.9 प्रतिशत हो गया है। 
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार अन्य राज्यों में जहां कुल आबादी में मुसलमानों की आबादी में वृद्धि हुई है, उनमें केरल (24.7 प्रतिशत से बढ़कर 26.6 प्रतिशत), गोवा (6.8 प्रतिशत से बढ़कर 8.4 प्रतिशत), जम्मू-कश्मीर (67 प्रतिशत से बढ़कर 68.3 प्रतिशत), हरियाणा (5.8 प्रतिशत से बढ़कर 7 प्रतिशत), दिल्ली (11.7 प्रतिशत से बढ़कर 12.9 प्रतिशत) शामिल हैं। केंद्र शासित क्षेत्रों में लक्षद्वीप में सर्वाधिक मुस्लिम आबादी 96.2 प्रतिशत है। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि डाटा अभी जनगणना महापंजीयक द्वारा संकलित किया जा रहा है और यह जल्द ही आधिकारिक तौर पर जारी किया जाएगा। गृह मंत्रालय के तहत महापंजीयक और जनगणना आयुक्त ने मार्च 2014 तक आंकड़े संकलित कर दिए थे, लेकिन पिछली संप्रग सरकार ने इन्हें जारी नहीं किया था। विशेषज्ञों ने कहा कि डाटा संग्रह के तीन साल के भीतर इस तरह के आंकडे जारी कर दिए जाते हैं और 2015 को देखते हुए समयसीमा पहले ही निकल चुकी है। पिछली बार धर्म आधारित आंकड़े 2004 में जारी किए गए थे , जो 2001 तक का रिकॉर्ड था। इन आंकड़ों के आने के बाद प्रत्याशित रूप से बयानबाज़ियाँ शुरू हो गयी हैं | वैसे हर जनगणना के बाद मुसलमानों पर सवाल उठाये जाते रहे हैं और मुस्लिम आबादी का हव्वा खड़ा किया जाता रहा है | कुछ साधू - संत पिछले दिनों हिन्दू जनसंख्या बढ़ाने से संबंधित बयान दे चुके हैं और हिन्दुओं को अल्पसंख्यक होने का भय दिला चुके हैं | लेकिन यह ऐसी स्थिति नहीं है , जिसके प्रति भय दिलाया जाए | असम और पश्चिम बंगाल के आंकड़ों के अतिरिक्त मुसलमानों की आबादी स्वाभाविक रूप से बढ़ी है | सच्चाई यह है कि मुसलमानों की आबादी पहले से घटी है |1991 से 2001 के बीच मुसलमानों की आबादी 29 प्रतिशत बढ़ी थी , जो 2001 से 2011 में घटकर 24 प्रतिशत रह गयी है , हालांकि कुल आबादी की औसत वृद्धि दर 18 प्रतिशत ही रही | इसके मुकाबले मुसलमानों की वृद्धिदर मात्र 6 प्रतिशत अधिक है , जो उसके पूर्वकाल से काफ़ी कम है | मुसलमानों का लिंगानुपात यह बताता है कि 1000 मुस्लिम मर्दों की तुलना में औरतें 936 ही हैं |  मुसलमानों की आबादी के बढ़ने के दो प्रमुख कारण हैं -  पहला , उनकी जीवन प्रत्याशा हिन्दुओं से अधिक 68 वर्ष है , जबकि हिन्दुओं की 65 वर्ष है | दूसरा प्रमुख कारण मुसलमानों में बाल मृत्यु दर का कम होना है | हिन्दुओं में बाल मृत्यु दर 76 है , जबकि मुसलमानों में केवल 70 है [ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण - 3 , 2005-06 , पृष्ठ 182 टेबल 7.2 ] | अतः व्यर्थ का हो - हल्ला करनेवालों को चाहिए कि सही तथ्य ही अवाम के सामने पेश करें , कुतर्क करके भ्रम की स्थिति न पैदा करें | 
- Dr. Muhammad Ahmad

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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