Jan 23, 2015

ग़ैर ज़िम्मेदार मीडिया की वकालत क्यों ?

ग़ैर ज़िम्मेदार मीडिया की वकालत क्यों ?
मीडिया की आज़ादी के लिए दशकों पूर्व गठित प्रेस परिषद के नये अध्यक्ष जस्टिस चन्द्रमौलि कुमार प्रसाद का मानना है कि लोकतंत्र में नियंत्रित मीडिया की अपेक्षा गैर जिम्मेदार मीडिया होना ज्यादा बेहतर है। साथ ही यह भी कहा कि प्रेस की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता में होगी। उनका मानना है कि '' अगर मीडिया गैर जिम्मेदाराना काम करता है तो उसकी जांच परख हो , लेकिन यदि इसे नियंत्रित किया जायेगा तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही नहीं रह जायेगा। मीडिया के लिए आत्म -नियमन सर्वश्रेष्ठ बात है , लेकिन मीडिया का नियंत्रण नहीं।'' इससे पहले प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने चेतावनी दी थी कि कुछ नियंत्रण भी लगाए जा सकते हैं, क्योंकि आत्मनियंत्रण सही मामले में नियंत्रण नहीं हैं। आपातकाल के दौरान लगाई गई सेंसरशिप को छोड़कर आजादी के बाद से इस मामले में सरकार ने कभी कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया , जिसके कारण मीडिया स्वच्छंद हो गयी और यह स्वच्छन्दता समाज में अफरा - तफरी का कारण भी बनी और बन रही है
 केंद्र की सरकारें पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का अनुसरण करती आई हैं। नेहरू ने 3 दिसंबर, 1950 को अखिल भारतीय समाचार पत्र संपादक सम्मेलन को आश्वस्त किया था कि मैं प्रेस को पूरी स्वतंत्रता दूंगा, लेकिन जस्टिस काटजू ने दूसरी बात कही थी , जिसका मीडिया के एक वर्ग ने विरोध भी किया था | लेकिन यह सच है कि जस्टिस काटजू स्तरीय मीडिया के पक्षधर थे | मीडिया से जुड़े लोगों के लिए एक शिक्षा - स्तर के हिमायती थे | उन्हें पता था कि अधकचरे लोग समाज को किस अंधी सुरंग में ले जाकर फंसा देते हैं ! स्वच्छन्दता - स्वेच्छाचारिता समाज में कितनी बड़ी अव्यवस्था पैदा कर रही है ! ग़ैर ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता के परिणाम सदैव बुरे होते हैं | आज देश इन कुपरिणामों को भुगतने के लिए अभिशप्त है | माना कि  
 लोकतांत्रिक व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। लेकिन क्या सलमान रुश्दी , तसलीमा नसरीन , ' शार्ली हाब्दो ' जैसे लोग लोकतंत्र की दुर्गति नहीं कर रहे हैं ? एम.एफ. हुसैन को शह देने से जो समस्याएं पैदा हुईं थी , वे हमारे सामने हैं |  संजय काक की डाक्यूमेंट्री जश्ने-आजादीमें सेना की गलत छवि पेश किये जाने के कारण प्रतिबंधित किया गया था | लोक व्यवस्था बनाये रखने की चिन्ता तो होनी ही चाहिए ताकि अव्यवस्था को रोका जा सके और समाज निर्धारित ध्येय, लक्ष्य और उद्देश्य की ओर आगे बढ़ सके। इसी प्रकार राज्य की रक्षा के लिए भी प्रतिबन्ध लगाये जाते रहे हैं , जो कि उचित है
व्यवस्था बनाये रखना राज्य का भी दायित्व है और नागरिक का भी | सहमति - असहमति की अभिव्यक्ति लोकतंत्र का अभिन्न अंग है , लेकिन असहमति या विरोध मर्यादा के अंतर्गत ही सह्य है , अन्यथा अराजकता की स्थिति में सज़ा योग्य है , जिसका ज़िम्मेदार सरकारें सदा पालन करती रहती हैं | जहां तक गैर जिम्मेदार मीडिया को बेहतर बताने से संबंधित प्रेस परिषद के नये अध्यक्ष का बयान है, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता , क्योंकि गैर जिम्मेदाराना रुख, व्यवहार और व्यवस्था समाज को तोडऩे और बिगाडऩे का ही काम करती है, बनाने का नहीं। 
प्रख्यात पत्रकार शीतला सिंह के अनुसार , '' यह कहा जा सकता है कि मीडिया आखिर गैर जिम्मेदार होकर भी क्या नुकसान कर सकता है। इस रूप में झूठी, काल्पनिक खबरें प्रकाशित करके वह लोकमानस को उकसा सकता है। इसलिए जिसे लोक  मानसिकता बनाने की छूट है उसे नियंत्रित भी करना पड़ेगा। आत्मनियंत्रण से यदि यह काम चले तो उसका स्वागत ही किया जायेगा। लेकिन प्रश्न यह है कि मीडिया कहीं दूसरे स्वार्थों से तो प्रेरित नहीं हो रहा है? क्या उसे अनुचित, अवैध और समाज विरोधी स्वार्थों की स्वतंत्रता देना उचित होगा। मीडिया का संचालन तो व्यक्ति के ही हाथों में होगा, इसलिए उसे सोच, विचार और चिंतन की स्वतंत्रता आवश्यक है। लेकिन यह स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया कैसे प्रभावित होती है, इसे बनाये रखना भी तो राज्य का दायित्व है। ''  हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता हो , जब यहाँ की प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में इस्लाम या मुसलमानों से संबंधित भ्रामक और गुमराहकुन ख़बरें , रिपोर्टें या अन्य सामग्रियां न प्रकाशित - प्रसारित होती हों
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ ऐसा ही माहौल बना हुआ है | इनका बड़ा वर्ग एक तरह से न्याय और इंसाफ़ को भूल चुका है | वह मीडिया को अपने घिनौने हित साधन का उपकरण मात्र समझता है | देशी - विदेशी मीडिया की इस्लाम दुश्मनी किसी से छिपी भी नहीं है | कमोवेश दोनों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा है | इस प्रजाति की मीडिया की हरकतें इस्लाम से जुड़े लोगों और संगठनों की छवि बुरी तरह बिगाड़ने की रही है | मिस्र की इस्लामपसंद इख्वानुल मुस्लिमून पार्टी हो या अल्जीरिया की इस्लामिक साल्वेशन फ्रंट या तुर्की की रिफाह पार्टी आदि की यह मीडिया खास तरह की दुश्मन है | इस मीडिया में मुस्लिम देशों चल रहे इस्लामी आंदोलनों को आतंकवाद से जोड़ने का दुस्साहस किया ही जाता है , दुनिया के किसी हिस्से की इस्लामी बेदारी को भी किसी भी रूप में सहन नहीं किया जाता | अतएव देखा गया कि जहाँ - जहाँ भी इस्लाम के नाम पर लोगों ने संगठित होने या उभरने की कोशिश की , उनके विरुद्ध बड़े पैमाने पर नियोजित ढंग से दुष्प्रचार छेड़ा गया | उन्हें डराने - धमकाने की भरपूर कोशिशें की गयीं | वर्तमान में भी यही सब कुछ किया जा रहा है | मुस्लिम देशों में अपने हिमायतियों के द्वारा कठपुतली सरकारों का भी गठन करके इस्लामपसंदों  का दमन करने की अमेरिका और पश्चिमी देशों की नापाक कोशिशें जारी हैं
मिस्र में तो दमन की हद कर दी गयी है | बोस्निया , चेचन्या , इराक़ और अफ़गानिस्तान आदि के बाद अब मिस्र सीधे तौर पर इनके निशाने पर है | हमारे देश की वर्चस्ववादी मीडिया की इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी पुरानी हैं , हालाँकि भारतीय मुसलमान बहुत ही ज़िम्मेदार नागरिक की तरह शांतिपूर्ण ढंग से रहते हैं | फिर भी इनकी छवि बिगाड़ी जाती है , वह भी बक़ायदा अभियान चलाकर | इनके द्वारा कुछ तोतारटंत झूठी बातें इस तरह फैलाई जाती हैं - कभी कहा जाता है कि देश के  मुस्लिम क्षेत्रों में आतंक के अड्डे बने हुए हैं | इनमें मदरसों को भी शामिल करने की कुचेष्टा की जाती है | इसी सिलसिले में आई एस आई के देश में अड्डे चलने की बात है | तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इस पर श्वेत - पत्र लाने की घोषणा की थी , मगर वह उनकी घोषणा मात्र रही
हमारे देश में कई ऐसे पत्रकार रहे है और हैं जो मुसलमानों के खिलाफ़ ही लिखते रहते हैं | अरुण शौरी , बलबीर पुंज , भानु प्रताप  शुक्ल , राजीव सचान , हृदय नारायण दीक्षित जैसे लोग तो लगता है कि मुसलमानों के सबसे बड़े छविभंजक बने हुए हैं | मीडिया को बहुत - से ऐसे मुद्दे भाते हैं , जिनसे मुसलमान आहत होते हैं | 1985 का शाहबानो केस भारतीय मीडिया का प्रिय विषय बना रहा ! आमिना केस भी ऐसा ही रहा | गुड़िया - प्रकरण के बहाने भी इस्लाम और मुसलमानों के बारे में ग़लतफहमियां फैलाई गयीं | कभी क़ुरआन की आयतों पर कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस चाँदमल चोपड़ा की टिप्पणियों की आड़ में , तो कभी इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस हरिनाथ तिलहरी ने तीन तलाक़ के मसले के बहाने इस्लामी शरीअत पर गंभीर हमले किए , जिन्हें मीडिया ने अनावश्यक हवा दी और माहौल को बिगाड़ा
नरेंद्र मोदी के पक्ष में प्रचार की मीडिया ने हद कर ही दी है , 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के समय भी कुछ हिंदी अख़बारों ने इतना माहौल बिगाड़ दिया था कि कई स्थानों पर दंगे भड़क गये थे | आज , दैनिक जागरण , स्वतंत्र भारत और स्वतंत्र चेतना के उत्तर प्रदेश से प्रकाशित संस्करणों में बड़ी मनगढ़ंत ख़बरें छापी गयीं | इन अफ़वाह और भड़काऊ खबरों ने सांप्रदायिक सद्भाव को बुरी तरह बिगाड़ कर रख दिया | आज [ आगरा ] ने इतनी निराधार खबर छाप दी , जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है | अख़बार ने 11 से लेकर 13 दिसंबर 1990 के बीच इस आशय की खबर छापी कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कालेज में भर्ती 32 हिन्दू मरीज़ों को ज़हरीला इंजेक्शन देकर मार डाला गया | ज़ाहिर है , यह खबर झूठी थी , मगर प्रेस कौंसिल ने उसकी निंदा करने के अलावा कुछ नहीं किया | कुछ ऐसी ही हरकतें आये दिन मीडियावाले करते हैं और बचे रहते हैं ! है ना यह आधुनिक युग का ' चमत्कार ' ! सारे अपराध करो और बचे रहो !! ये घटनाएं इस बात की सबूत हैं कि मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी को सही तौर पर नहीं निभा रहा है और इसका स्वेच्छाचार देश के लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है |           


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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