Jan 14, 2015

महंगाई घटाएं , लोकतंत्र में जनहित की अनदेखी उचित नहीं

महंगाई घटाएं , लोकतंत्र में जनहित की अनदेखी उचित नहीं 

भाजपा के महंगाई घटने की बयानबाज़ी व पोस्टरबाज़ी के खुदरा महंगाई बढ़ने के सरकारी आंकड़ों ने भाजपा के हवाई किले की हकीक़त को एक बार फिर उजागर कर दिया है | अतः यह कहा जाने लगा है कि मोदी सरकार की कोशिशों से देश का औद्योगिक उत्पादन बढ़ा है , लेकिन औद्योगिक उत्पादन बढने का लाभ आम जन को कितना और किस रूप में मिल रहा है , कोई नहीं बता पा रहा है ! दोनों बातें सच हैं कि औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े में नवंबर माह में 3.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई और इसके साथ ही खुदरा महंगाई पर दबाव बढ़ा है | 12 जनवरी को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार , दिसंबर माह की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.78% हो गयी जो इससे एक माह पूर्व 3.14% थी। चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-नवंबर के दौरान औद्योगिक उत्पादन की बढ़ोतरी दर 2.2 फीसदी रही | बताया जाता है कि फल एवं सब्जी समेत कुछ खाद्य वस्तुएं महंगी होने से खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ी है | उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति दिसंबर 2013 में 9.87% थी।सब्जियों की खुदरा कीमतें दिसंबर महीने में 0.58% बढ़ी जबकि नवंबर में इसमें 10.9 प्रतिशत की गिरावट आयी थी। फल आलोच्य महीने में 14.84 प्रतिशत महंगा हुआ इससे पूर्व महीने में इसमें 13.74 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।
 खाद्य एवं पेय पदार्थ (बेवरेजेज) की श्रेणी में आने वाले जिंसों के दाम दिसंबर, 2014 में एक साल पहले की तुलना में 5% बढ़े जबकि इससे पिछले महीने इसमें वृद्धि दर 3.5% थी। वहीं दूसरी तरफ अंडा, मछली और गोश्त जैसी अधिक प्रोटीन वाली खाने की चीजों की मुद्रास्फीति आलोच्य महीने में घटकर 5.24% पर आ गयी , जो इससे पूर्व महीने में 6.48% थी। तेल एवं वसा की कीमतों में भी दिसंबर महीने में सालाना आधार पर 1.24% की गिरावट आयी जबकि नवंबर में इनमें 0.83 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी थी। अन्य वस्तुओं में अनाज तथा उनके उत्पादों की मुद्रास्फीति दिसंबर, 2014 में घटकर 3.98% पर आ गयी जो इससे पूर्व महीने में 5.2% थी। दलहन एवं उसके उत्पादों की श्रेणी में खुदरा मुद्रास्फीति आलोच्य महीने में 7.24 प्रतिशत थी जो नवंबर में 7.54% थी। ईंधन एवं प्रकाश से जुड़ी वस्तुओं की मुद्रास्फीति दिसंबर, 2014 में नरम होकर 3.41% रही। दूध एवं उसके उत्पादों के मामले में महंगाई दर 9.62% रही जो एक महीने पहले 10.24% थी। साफ्ट पेय पदार्थों की मइंगाई दर आलोच्य महीने में 5.95% थी जो इससे पूर्व महीने में 5.75% थी। आंकड़ों के अनुसार , चीनी के दाम में दिसंबर में 0.84% की कमी आयी। इससे पूर्व नवंबर में भी इसमें 0.28% की गिरावट आयी थी। आलोच्य महीने में देश के शहरी भागों में उपभोक्ता मुद्रास्फीति बढ़कर 5.32% हो गयी जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह 4.71% थी। इससे पूर्व महीने में यह शहरी क्षेत्र में 4.69% तथा ग्रामीण क्षेत्र में 4.09 प्रतिशत |
यह भी सच है कि आर्थिक शब्दजालों से आम जनता अनजान है | वह समझती है कि महंगाई दर घटने का मतलब उपभोक्ता सामानों का सस्ता होना है | लेकिन जब वह बाज़ार जाता है , तो पिछले महीने की तुलना में अधिक कीमत पर चीज़ें खरीद कर लाता है। तब उसे अस्लियत का पता चलता है | वास्तव में महंगाई घटना एक भ्रमित शब्दजाल है | इसकी सच्चाई ट्रेन की स्पीड के उदाहरण से समझा जा सकता है | माना कि पिछले साल अक्टूबर में खुदरा महंगाई के रेल 110 किमी की रफ्तार से दौड़ रही थी | अब उसकी रफ्तार धीमी होकर 65 किमी हो गई है । इसी प्रकार थोक कीमतों की मुद्रा स्फीति रेल पिछले साल 72 किमी की रफ्तार से दौड़ रही थी | अब यह धीमी होकर 17 किमी की रफ्तार से चल रही रही है । कहने का मतलब है कि महंगाई कम नहीं हुई है , बल्कि बढऩे की रफ्तार धीमी हुई। वर्तमान परिस्थितियों में धीमी रफ्तार भी एक उपलब्धि है । वस्तुओं की लागत में वृध्दि के कारण महंगाई शून्य स्तर पर तो नहीं लाई जा सकती, किन्तु इसे न्यूनतम स्तर पर रखा जा सकता है । कुछ अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि सकल घरेलू उत्पाद [जी.डी.पी.] में वृद्धि आवश्यक है | अतः आम आदमी के काम में आने वाली रोजमर्रा की वस्तुओं के उत्पादन में तेजी से वृध्दि जरूरी है। इस विचार से सहमत नहीं हुआ जा सकता , क्योंकि जनहित पहले हैं और हमारे देश लोकतान्त्रिक देश है , जो ' जनता का , जनता के लिए , जनता द्वारा ' के उसूल पर चलता है | इसलिए ज़रूरी है कि महंगाई घटे और आम जन को राहत मिले |
- डॉ . मुहम्मद अहमद

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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