Dec 28, 2014

बाबरी मस्जिद की शहादत और इन्साफ के तक़ाज़े

बाबरी मस्जिद की शहादत और इन्साफ के तक़ाज़े 


6 दिसंबर 2014 को बाबरी मस्जिद की शहादत के 22 साल पूरे हो चुके हैं | इस दुखद और निंदनीय घटना ने देश की राजनीति और समाज को एक लंबे अरसे से प्रभावित किया है, लेकिन न्याय करने एवं समस्या के समाधान में देश की सम्मानित न्यायपालिका , केंद्र और राज्य सरकारें अभी तक नाकाम रही हैं | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर खामोशी बनाए रखी है , जबकि उन पर उन लोगों का ज़बरदस्त दबाव है , जो कट्टर हिन्दुत्ववादी हैं | कुछ राजनीतिक प्रेक्षक यह भी मानते हैं कि आने वाले दिनों में इस विवाद को हल करने का लिए उन पर दबाव बढ़ता जाएगा क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत हासिल है और उससे जुड़े हिंदुत्ववादी संगठन इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं | अदालत में इसका मुक़दमा 1949 से चल रहा है | मुसलमानों की ओर से इसके एक प्रमुख पक्षकार हाशिम अंसारी हैं , जो भूमि के मालिक़ाना हक़ का मुकदमा लड़ते-लड़ते 92 साल के हो चुके हैं | उनका भी यह मानना है कि इसका फ़ैसला न्यायालय को जल्द करना चाहिए | यह विवाद अंतिम फ़ैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट में है | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो फ़ैसला सुनाया है उसे इस केस के तीनों पक्षों ने चुनौती दे रखी है | हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अपने फ़ैसले में बाबरी मस्जिद के बाहरी आँगन में स्थित राम चबूतरे और सीता रसोई पर निर्मोही अखाड़ा का दीर्घकालीन कब्ज़ा मानते हुए उसे देने का निर्णय किया था | इसके अलावा मुख्य गुम्बद के नीचे की ज़मीन रामजन्म भूमि मानते हुए राम लला को देने का आदेश किया था | लगभग 1500 वर्ग मीटर विवादित भूखंड का एक तिहाई मुस्लिम पक्षकारों को देने का फ़ैसला किया गया था , जिसमे सुन्नी वक्फ बोर्ड एवं अयोध्या के कुछ मुस्लिम नागरिक शामिल हैं |
 मुसलमान इस फ़ैसले से संतुष्ट नहीं थे , इसलिए उन्होंने भी इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी | मुसलमानों की ओर से एक और प्रमुख पक्षकार एडवोकेट ज़फ़रयाब जीलानी ने कहा था , '' उनकी अपील के मुख्यतः तीन आधार हैं | एक तो हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में श्रद्धा और विश्वास को तरजीह दी , जो सबूत की श्रेणी में नहीं आता | सबसे बड़ा सवाल यही है | दूसरा यह कहा गया कि ये स्थल हिंदू और मुसलमानों का साझा कब्ज़े वाला था , जबकि बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों का कब्ज़ा था और निर्मोही अखाड़े का बाहरी हिस्से पर | तीसरी बात यह कही गयी कि वहाँ जुमे को ही नमाज पढ़ी जाती थी , जबकि वहाँ पांचों वक्त नमाज होती थी | ''6 दिसंबर 1992 को कट्टर हिंदुत्ववादियों ने बाबरी मस्जिद को शहीद कर दिया था | विश्व हिन्दू परिषद , बजरंग दल , भाजपा और शिव सेना के लोगों ने इस बर्बर घटना को अंजाम दिया | इस दिन हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया, जिसके बाद देश के कई स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे हुए , जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये। अस्थाई रूप से राम मंदिर बना दिया गया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया, जो अब तक अधूरा है | 5 दिसंबर 1992 को ही अयोध्या में लाखों की संख्या में भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। राज्य सरकार सारे घटनाक्रम से अवगत थी , फिर भी एहतियाती क़दम नहीं उठाये गये | दूर - दूर से लोग इसमें हिस्सा लेने अयोध्या पहुँचते रहे। कारसेवको का नारा बार-बार गूंज रहा था '' मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे '' । यह तैयारी एक दिन पहले की गयी थी |कारसेवकों की भीड़ ने अगले दिन 12 बजे का वक्त कारसेवा शुरू करने का तय किया था , जो अहिस्ता - अहिस्ता उन्माद की शक्ल इख़्तियार कर रहा था | 
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 6 दिसंबर को सुबह 11 बजते ही कारसेवकों के एक बड़ा जत्था सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश करता है, लेकिन उसे पीछे धकेल दिया जाता है। तभी वहां कारसेवकों से घिरे हुए वीएचपी नेता अशोक सिंघल नज़र आते हैं कारसेवकों से घिरे हुए और वो उन्हें कुछ समझाते हैं। थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी के बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी भी इन कारसेवकों से जुड़ जातें हैं। तभी भीड़ में एक और चेहरा नजर आता है लालकृष्ण आडवाणी का। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद हैं और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। कारसेवकों के नारे वातावरण में गूंज रहें हैं। इसी बीच वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचता है। उसने पहले से वहां मौजूद कारसेवकों को कुछ समझाया। सबके चेहरे के भाव से लगता है कि वे किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे हैं। तभी एक चौकाने वाली घटना होती है। बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी धीरे धीरे बाहर निकल जाती है। न कोई विरोध, न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह। पुलिस के निकलते ही कारसेवकों का दल मस्जिद को मिस्मार कर देता है |1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजू गुप्ता 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने के समय फैजाबाद जिले की असिस्टेंट एसपी थीं | उन्हें आडवाणी की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। 2010 में उन्होंने एक बयान में कहा कि घटना के दिन आडवाणी ने मंच से बहुत ही भड़काऊ भाषण दिया था। 
इसी भाषण को सुनने के बाद कार सेवक और उग्र हो गए थे। अंजू गुप्ता का कहना था कि वे भी मंच पर करीब 6 घंटे तक मौजूद थी | इसी 6 घंटे में मस्जिद को शहीद किया गया था , लेकिन उस वक़्त मंच पर आडवाणी मौजूद नहीं थे। वे मस्जिद को मिस्मार करवाने में लगे रहे | उस समय वहां कल्याण सिंह की सरकार थी , जिसे बर्खास्त कर दिया गया | कल्याण सिंह को सुप्रीमकोर्ट ने सांकेतिक सज़ा दी | हैरत और चिंता की बात यह भी है कि बाबरी मस्जिद की शहादत और इसके नतीजे में देश के कई हिस्सों में हुई सांप्रदायिक दंगे के मुख्य आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई !  

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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