Dec 28, 2014

भ्रामक और अविश्वसनीय रिपोर्ट

भ्रामक और अविश्वसनीय रिपोर्ट 
जस्टिस जी टी नानावती और जस्टिस अक्षय एच मेहता के नेतृत्व वाले  दो सदस्यीय जाँच आयोग ने गुजरात दंगे के 12 साल बाद विगत 18 नवंबर को अपनी रिपोर्ट गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल को सौंप दी है , लेकिन यह संगीन अपराध से कम नहीं है , क्योंकि यह मुस्लिम विरोधी हिंसा की खुली लीपापोती का जीवंत प्रयास है ! आयोग ने दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनके मंत्रिमंडल के साथियों, राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों या किसी अन्य के किसी प्रकार शामिल होने से इन्कार किया कर दिया है। बताया जाता है कि इस आयोग ने 2002 के गुजरात दंगों में तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका की भी जांच की। टर्स्म ऑफ रिफ्रेंस के आधार पर तब की प्रदेश मोदी कैबिनेट, सीनियर सरकारी पुलिस ऑफिसर और दक्षिणपंथी संगठनों की भूमिका की भी जांच की गई , लेकिन इन सबको क्लीन चिट दे दी गयी | यह आयोग 18 सितंबर 2008 में अंतरिम रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप चुका है , जिसमें भी सरकारी पक्ष की भूमिका को नकारा गया था | बताया जाता है कि आयोग को तत्कालीन सरकार की निष्क्रियता या धार्मिक नेताओं और नेताओं की सक्रियता के कोई सबूत नहीं मिले हैं। गोधरा में नृशंस वारदात के बाद लोगों का गुस्सा फूटा। जिस वजह से दंगे हुए। इस तरह आयोग ने मोदी की एक्शन-रिएक्शन थ्योरी को ही सपोर्ट किया है। सेना को बुलाने में देरी पर भी आयोग ने तत्कालीन मोदी सरकार को क्लीन चिट दी है। 
आयोग का कहना है कि राज्य सरकार के कहने पर बैरक में से निकलते ही सैनिक गली-कूचे में तैनात नहीं हो सकते। दंगों के वक्त यह नहीं कहा जा सकता कि- दंगों के समय सेना तैनात करने में सरकार ने इरादे के साथ विलंब किया। इस आयोग को 12 साल के कार्यकाल में 25 बार सेवा विस्तार मिला। 46,494 शपथपत्रों की जांच की गई। 6 मार्च 2002 को इस आयोग का गठन तत्कालीन मोदी सरकार ने किया था | बताया जाता है कि  आयोग तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अन्य मंत्रियों से पूछताछ कर सकता था , लेकिन कोई सबूत नहीं मिला, जिसके आधार पर किसी को समन भेजा जाए। हालांकि, आयोग ने यह भी कहा है कि सरकार और आयोग के बार-बार कहने के बाद भी बड़े अधिकारियों ने शपथ-पत्र नहीं दिए। हालांकि, आयोग ने अखबारों और टीवी चैनलों की आलोचना की है। कई घटनाओं को बेवजह तूल दिया गया, जिससे हालात और बिगड़े।जस्टिस नानावती ने कहा, 'मैंने 2,000 पन्नों में मुख्यमंत्री को फाइनल रिपोर्ट सौंप दी है।' ' इंडियन एक्सप्रेस ' द्वारा यह पूछे जाने पर कि उन्होंने मोदी को पूछताछ हेतु क्यों नहीं बुलाया ? उन्होंने कहा कि क्या हर व्यक्ति को बुलाना न्यायोचित है ? जस्टिस नानावती ने पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन के इस आरोप कि गुजरात दंगे केंद्र और राज्य सरकार की साज़िश का नतीजा थे , उन्होंने कहा कि ' यदि ऐसा है तो उन्हें सबूत देता चाहिए , लेकिन मुझे पता है कि सबूत नहीं दिया जा सकता | ' सन 2005 में मलयालम पत्रिका ' मानव संस्कृति ' को दिए गये इन्टरव्यू में पूर्व राष्ट्रपति ने कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को गुजरात में बिगड़ते हालात को संभालने के लिए कई पत्र लिखे थे , मगर उन पर ध्यान नहीं दिया गया | बताया जाता है कि इन पत्रों को नानावती आयोग ने राष्ट्रपति भवन से तलब किया था , मगर सुरक्षा कारणों से उसे उपलब्ध नहीं कराया गया | फिर भी पूर्व राष्ट्रपति ने आठ अप्रैल 2005 को आयोग को पत्र लिखकर पत्र के सभी विवरणों से अवगत कराया | इसके बावजूद इस तथ्य की जाँच नहीं हो पाई !इस प्रकार यह रिपोर्ट कई दृष्टियों से अपूर्ण , अविश्वसनीय और भ्रामक है | 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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