Dec 31, 2014

बलात्कार की बढ़ती घटनाएं , इंसानियत पर कलंक

बलात्कार की बढ़ती घटनाएं , इंसानियत पर कलंक 

16 दिसंबर 2014 को दिल्ली के मुनरिका में दामिनी [ ज्योति सिंह पाण्डेय ] रेप कांड हुआ था , जिसको लेकर काफ़ी जनचेतना जगी थी , लेकिन इसमें राजनीतिक पुट आ जाने से मानसिकता में बदलाव की जो गति होनी चाहिए , वह नहीं आ सकी | फ़ास्ट ट्रैक सुनवाई के बावजूद बलात्कारियों को फांसी की सज़ा पर अभी तक अमल नहीं हो सका है ! यह और बात है कि राम सिंह नामक एक आरोपी ने 11 मार्च 2013 को जेल में ही आत्महत्या कर ली | बचाव पक्ष के वकील ने इसे हत्या क़रार दिया | सज़ा में विलंब और शिक्षाप्रद सज़ा के अभाव के कारण भी महिला विरोधी हिंसाचार में कमी नहीं आ सकी और देश के अन्य भागों की तरह राजधानी दिल्ली में भी ऐसे आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं | विगत पांच दिसंबर को दामिनी कांड की तरह की घटना घटी | 27 साल की महिला से बलात्कार के आरोपी अमेरिकी कैब कंपनी उबर के ड्राइवर को सात दिसंबर को मथुरा से गिरफ्तार कर लिया गया। साथ ही टैक्सी मुहैया कराने वाली इस कंपनी को दिल्ली पुलिस ने मामले की जांच में शामिल होने का निर्देश दिया है | आगरा रेंज की डीआइजी लक्ष्मी सिंह के नेतृत्व में गठित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी की टीम ने दिल्ली पुलिस के साथ मिलकर मथुरा निवासी 32 साल के टैक्सी ड्राइवर शिव कुमार यादव को गिरफ्तार कर लिया। उसे मथुरा के सदर पुलिस थाने के तहत दिल्ली-आगरा राजमार्ग पर एक मैरिज हॉल के पास से गिरफ्तार किया गया। डीआइजी के मुताबिक, जिस टैक्सी में यह अपराध हुआ है, वह यादव की थी और उसके मोबाइल नंबर के जरिए उसका पता लगाया गया। वैसे यह बलात्कार की अकेली घटना नहीं है | दामिनी कांड से इसकी कुछ समानता होने के कारण मीडिया ने इसे थोड़ा महत्व दिया | कितनी चिंता और आश्चर्य की बात है कि देश की राजधानी दिल्ली में महिला अपराध घट नहीं रहे | आंकड़ों के मुताबिक़ , यहाँ महिला विरोधी हिंसा के प्रतिदिन चालीस मामले दर्ज होते हैं , जिनमें बलात्कार के चार मामले होते हैं | इन मामलों में 15 . 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | दिल्ली में 17 फ़रवरी 2014 से राष्ट्रपति शासन लागू है | आंकड़ों के मुताबिक़ , दिल्ली में पिछले दस महीनों के दौरान बलात्कार की उन्नीस सौ घटनाएं हुई हैं , जो कि एक रिकार्ड है |  स्थिति बिगड़ती जा रही है ..... महिलाओं का मान - सम्मान धूल - धूसरित हो रहा है | 
यह हकीक़त भी  लोगों को पता है कि इन घटनाओं के साथ ही  कन्या - भ्रूण हत्या और विभिन्न रूपों में महिला - शोषण जारी है ! आज इधर - उधर की बातें बहुत की जा रहीं हैं | महिला - दिवस भी मनाया जाता है ... हर साल बड़े धूम - धाम से आलमी सतह पर .... पर महिला आज भी बहुल भावना और विचार के यथार्थ धरातल पर दोयम दर्जे पर है . उसके प्रति सामाजिक सोच में दोहरापन मौजूद है , यानी महिला होने के कारण वह अपने नैसर्गिक एवं फ़ितरी अधिकारों से वंचित है | अभी पिछली सदी में महिलाओं के प्रति जागरुकता का परिचय देते हुये अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने आह्वान किया और 8 मार्च का दिन महिलाओं के सशक्तीकरण के रूप में मनाया जाने लगा | सबसे पहले 28 फरवरी 1909 ई. को अमेरिका में यह दिवस मनाया गया, लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी शुरुआत की गई थी, वह बहुत पहले ही खत्म हो गया था | बस औपचारिकता अब तक बाक़ी है | आज दुनिया के सभी तथाकथित विकसित और विकासशील देशों में भी महिलाओं को लेकर लगभग एक जैसी दुखद  स्थिति बनी हुई है | भौतिक रूप से समाज और देश ने भले ही खूब तरक्की कर ली हो, लेकिन इस बात से इन्कार करना मुश्किल है कि महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक नहीं है | सृष्टि में उसकी रचना भी उन्हीं गुणों और तत्वों के आधार पर हुई है, जिससे पुरुष बना है, किन्तु सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से महिला अभी भी न्याय की राह तक रही है | उसे न्याय नहीं मिल सका है | सामाजिक, आर्थिक आदि स्तरों पर महिलाएं आज भी बहुत पिछड़ी हैं | सोचा तो यह भी गया था कि हमारे सामाजिक नजरिये में व्यापक बदलाव आयेगा और समाज अपने अभिन्न अंग को स्वयं के बराबर का दर्जा दे सकेगा, लेकिन ऐसा केवल पुस्तकीय ज्ञान और मंचीय भाषण तक सीमित होकर रह गया | ऐसे में यह विचार करना होगा कि साल में एक दिन महिलाओं के विषय में चिन्ता करना क्या पर्याप्त है या हमें उनके प्रति बाकी दिनों में भी चिन्ता करनी  चाहिये | संबंधों की बुनियाद पर आज किसी भी महिला को दहेज की दहलीज पार करनी पड़ती है , अन्यथा उसके साथ जो हश्र होता है वह किसी से छिपा नहीं है | हकीक़त यह है कि आज शिक्षा का प्रतिशत बढऩे के साथ ही नैतिकता का स्तर काफी गिरा है | दहेज  के कारण हत्याएं, मुकदमेबाजी, तलाक, बलात्कार जैसी घटनाओं ने तो मानवता के मुख पर कालिख ही पोत दी है . बिना किसी पूर्वाग्रह के बात करें तो शहरों की स्थिति बड़ी नाजुक है, जो जितना अधिक उच्च शिक्षित, बड़े सामाजिक दायित्व वाला है, वह उतना ही अनैतिक आचरण करते सुना जाता है | वास्तव में महिला - सम्मान की बात केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाती है | महिलाओं की मानसिक और वैचारिक स्थिति का यदि नैतिकता के आधार पर अध्ययन किया जाए तो ऐसे आंकड़े सामने आएंगे, जो हमारे सामाजिक खोखलेपन को रेखांकित करेंगे | कुछ समय पहले राष्ट्रीय स्तर पर जारी एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि एशिया में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लड़कियों को वेश्यावृत्ति के धंधों में उतारा जाता है | यह आंकड़ा कोलकाता, दिल्ली आदि महानगरों में ज्यादा है | इसी प्रकार से विदेशों में भारत से भेजी जाने वाली घरेलू कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी लज्जास्पद है | अखबार और टेलीविजन के पर्दे पर जब कभी कोई महिला यदि रोते बिलखते अपनी पीड़ा लेकर आती है , तब हम सामाजिक न्याय के झंडे उठा लेते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कितनी जिन्दगियां सिसकते आंसुओं के सैलाब में अपना गुजर कर रही हैं | उनका तो कोई पुरसानेहाल नहीं हैं . अतः जरूरी है कि सामाजिक संदर्भों में हमें महिलाओं  के प्रति अपनी दृष्टि को और व्यापक , पारदर्शी और उदार बनाएं | इस्लामी शिक्षाओं की ओर रुजू करें , जो महिला - समस्याओं का भी प्रभावी हल पेश करती हैं |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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