Dec 28, 2014

हिन्दू कौन और राष्ट्र क्या ?

हिन्दू कौन और राष्ट्र क्या ?

भाजपा के केन्द्रीय सत्ता में आते ही भाजपा नेताओं ने हिन्दू राष्ट्र का जो राग छेड़ा था , वह दिन प्रतिदिन तेज़ होकर अलाप की शक्ल इख़्तियार कर चुका है | यह अच्छा ही हुआ कि कुछ हफ़्ते पहले गोवा के उपमुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा जो अपने को ईसाई हिंदू बताने के साथ ही देश को हिंदू राष्ट्र बता रहे थे, उन्होंने अपने बयान पर माफी मांग ली। अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी इसी बात पर अपनी जुबान खोली है और कई उत्तेजक , भ्रामक एवं आपत्तिजनक बातें कही हैं  , मगर क्या वे भी माफ़ी मागेंगे ? भागवत ने गत 20 दिसंबर 2014 को कोलकाता में विश्व हिंदू परिषद के एक सम्मेलन में कहा कि जवानों की जवानी जाने से पहले देश को हिंदू राष्ट्र बना दिया जाएगा। उन्होंने पाकिस्तान को भी भारत की भूमि बताया।
 मोहन भागवत ने कहा कि लोगों के देखते-देखते हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना पूरा हो जाएगा, अब इसमें ज्यादा देर नहीं है। हिंदू समाज अब जाग गया है और किसी को डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, 'हम किसी का परिवर्तन नहीं करते, भूले भटकों को वापस लाते हैं। हमारे ऐसे ही गए थे। लोभ-लालच से लूट लिए गए। हमारा माल लूट लिया गया है, हम अपना माल वापस ले रहे हैं। किसी को क्या दिक्कत है? आपको पसंद नहीं है तो कानून लाओ।' हिंदू बिना किसी का कल्याण नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, 'हम किसी का परिवर्तन नहीं करते लेकिन हिंदू बदलाव नहीं लाएंगे तो हिंदुत्व नहीं बदलेगा। हम इस मुद्दे पर सख्ती से कायम हैं। हम सिर काटने वालों से लोगों को बचाएंगे।'
 संघ प्रमुख के इस बयान से साफ़ है कि आनेवाले दिनों में इस मुद्दे पर अन्य गतिविधियाँ सामने आएँगी | भाजपा की केंद्र सरकार बनने के तत्काल पहले और बाद में भाजपा और संघ परिवार के कुछ लोग हिन्दू राष्ट्र एवं हिंदुत्व की बांगबाज़ी करनेवाले नेताओं को मोदी के चुप कराया था , मगर संघ प्रमुख को कौन चुप करा सकता ? यहाँ तक किहिंदुत्व-रक्षा के नाम पर हमेशा आक्रामक तेवर में रहने वाले प्रवीण तोगड़िया भी थोड़ा खामोश थे । चुनावों में जो लोग हिंदू राष्ट्र के नाम पर वोट मांगना चाहते थे उन्हें तो पहले ही चुप करा दिया गया था, वे भी इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे थे । लेकिन अब मोहन मोहन भागवत के बयान ने उन्हें ख़ामोश न रहने की हिदायत दी है ! 
यह सौ फ़ीसदी सच है कि देश के भावी स्वरूप और भविष्य का निर्धारण देश की जनता को करना है। यह हथियारों के बल पर या धौंस - धांधली के बल पर संभव नहीं | होगा भी तो क्षणिक - सामयिक ही होगा | संविधान परिवर्तन आसान नहीं | प्रभावी जनशक्ति से ही यह संभव है। भाजपा के पास प्रभावी जनशक्ति नहीं है | आज भी राज्यसभा में उसे बहुमत प्राप्त नहीं है | अतः अपने फ़ैसलों के लिए वह अध्यादेशों की ओर देखने लगी है | संवैधानिक दृष्टि से सरकार को ही भावी स्वरूप निर्धारित करने का अधिकार है- संवैधानिक निष्ठा की शपथ के माध्यम से शासन संभालने वाले, जिन्हें लोकसभा के प्रति जवाबदेह माना गया है। उसी संसद को जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों आती हैं, संविधान में परिवर्तन और परिवर्धन का भी अधिकार है। अब यह बाधा भी सर्वोच्च न्यायालय ने दूर कर दी है | पहले किसी खंडपीठ का यह निर्णय था कि संसद को मूल अधिकारों और संविधान के बुनियादी स्वरूप में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है। 
मूल अधिकारों में से जब संपत्ति का अधिकार समाप्त करने संबंधी परिवर्तन संसद ने सरकार की इच्छा से किया और बहुमत से वह पारित भी हो गया, राष्ट्रपति ने उसे स्वीकृति भी प्रदान कर दी, तब सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे संविधानेतर नहीं माना। जब यह मान लिया गया कि संविधान के किसी अंग को संसद द्वारा संशोधित किया जा सकता है, बाध्यता यही होगी कि यह संशोधन किसी अन्य प्रसंग में विरोधाभासी न हो या उसके विपरीत अर्थ न निकाले जाएं जिससे संविधान में एकरूपता के बजाय दोहरापन दिखाई दे। 
जहां तक हिंदू राष्ट्र का प्रश्न है, इसमें दोनों शब्दों को पुनर्परिभाषित करना पड़ेगा। राष्ट्र शब्द भी शासन या सत्ता का परिचायक नहीं बल्कि अंग्रेजी के नेशन या कौम का परिचायक है, इस कौम की पहचान जाति या धर्म नहीं है। अंग्रेजी शब्दकोशों के अनुसार, राष्ट्र का अर्थ है जहां एक भाषा, धर्म, संस्कृति, जीवन पद्धति और दर्शन वाले लोग रहते हों। यूरोप 28 देशों में विभाजित है लेकिन उसे राष्ट्र माना जाता है क्योंकि उसके अंतर्गत ये अपेक्षित समानताएं हैं। लेकिन यह बात भारत के बारे में नहीं कही जा सकती, जहां विभिन्न संस्कृतियां, जीवन दर्शन, मान्यताएं, धर्म, आस्थाएं विद्यमान हैं, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग विभिन्नताओं के फलस्वरूप रहते हों। 
शासकीय दृष्टि से तो कभी बर्मा और लंका भी इस देश के अंग थे। आज भी ब्रिटेन में जिन्हें सामान्य रूप से इंडियन कहा जाता है उनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमा के लोग भी आते हैं। लेकिन क्या इनकी एकता संभव है? हिंदुत्व अगर संयोजक तत्त्व होता तो पड़ोसी नेपाल इसका अंग होता, जिसे विश्व हिंदू परिषद के लोग भी हिंदू राष्ट्र बताते हैं। लेकिन वहां भी अब इस स्थिति में परिवर्तन आया है, भारत में मिलने के लिए न वह पहले तैयार था और न आज है । जब इस देश का विभाजन हुआ तो वह भी धर्मों पर आधारित नहीं था। ब्रिटिश संसद ने जिस विभाजन को मंजूरी दी थी उसका आधार यह था कि जहां मुसलिम लीग जीती है उसे पाकिस्तान और जहां कांग्रेस जीती है उसे इंडिया या भारत मान कर अलग किया जाए। अतः यह कहा जा सकता है कि राष्ट्र का अर्थ किसी धर्म या विचारधारा का देश नहीं , बल्कि वहां रहनेवालों का देश , चाहे वे जिस धर्म या विचारधारा को मानते हों | 
अब  ' हिन्दू ' शब्द पर भी गौर करना आवश्यक है | यह शब्द हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में नहीं मिलता |  संघ और विहिप के नेता कहते हैं कि जिसे हिंदू कोड बिल में हिंदू माना गया है वे सब हिंदू हैं। यह बात किसी की समझ में नहीं आ सकती | कोड में तो सिख भी आते हैं, बौद्ध और जैन भी आते हैं। बौद्धों को देश से बाहर करने के लिए जो अभियान कभी चला था, इतिहास में वह भी दर्ज है और दुनिया उसे जानती है। बौद्ध देश या बौद्ध समुदाय क्या हिंदू राष्ट्र बनने के लिए तैयार हैं? बौद्धों की संख्या दुनिया में तीसरे नंबर पर है और जिन्हें हिन्दू बताते हैं उनकी चौथे नंबर पर। सिखों की भी अपनी अलग पहचान है |
सच्ची बात तो यह है कि देश को हिन्दू राष्ट्र बनाया ही नहीं जा सकता | इसकी परिकल्पना में हिन्दू कहलाने वाले लोगों के लिए ही स्थान नहीं , तो अन्य धर्म के माननेवालों की बात बहुत दूर की है | देश के पूर्वोत्तर में कई राज्य ईसाई बहुल हैं, और कश्मीर का वह हिस्सा जो भारत के पास है वह मुस्लिम बहुल है। आर्य - अनार्य - द्रविड़ के साथ शैव - वैष्णव आदि मत - मतान्तर हिन्दू कहलानेवाले लोगों के बीच है | हिंदुत्व के नाम पर आज भी इनमें वास्तविक एका का अभाव ही है | अतः हिंदी राष्ट्र की बात बेमानी और अव्यावहारिक है |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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