Dec 28, 2014

इस्लाम की छवि धूमिल न करें

तवलीन सिंह की गलतबयानी 

इस्लाम की छवि धूमिल न करें 
मशहूर पत्रकार तवलीन सिंह ने ' जनसत्ता ' में अपने रविवारीय कालम ' वक़्त की नब्ज़ ' [ 2 नवंबर 2014 ] में अनजाने में ही सही मगर इस्लाम पर अनुचित , गलत और भ्रमकारी टिप्पणियाँ की हैं | वे लिखती हैं , '' समझे होते संघ के बुद्धिजीवी तो कभी न करते हिन्दू धर्म के इस्लामीकरण की बातें | वह भी ऐसे समय जब जब दुनिया भर में उन मज़हबों को नकारा जा रहा है , जिनका आधार है किसी रसूल द्वारा पाया गया ऐसा धार्मिक ग्रन्थ जिसमें एक शब्द भी नहीं बदला जा सकता है , क्योंकि ' भगवान की वाणी ' को कैसे कोई बदले ? सीरिया के रेगिस्तान में जब पत्रकारों की गर्दनें काटी जाती हैं और उनके वीडियो दिखाए जाते हैं इंटरनेट पर अल्लाह के नाम पर | और जब किसी औरत को खड्डे में बिठाकर पत्थरों से मारा जाता है वह भी अल्लाह के नाम पर | '' वास्तव में यह अनुचित टिप्पणी सिर्फ़ इस्लाम पर नहीं , उन सभी धर्मों पर है जो अल्लाह के पैगंबरों से मंसूब हैं अर्थात ईसाई , यहूदी धर्म | यह उन धर्मों के ख़िलाफ़ है , जो किसी एक व्यक्तित्व से संबद्ध हैं , जैसे पारसी , बौद्ध , सिख , जैन आदि धर्म | मगर तवलीन जी की आगे की इबारत बता रही है कि उनकी प्राथमिक टिप्पणी इस्लाम धर्म के विरुद्ध है ! तवलीन जी को यह पता होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के निजी कृत्य यह आवश्यक नहीं कि उसके धर्म की शिक्षाओं के अनुरूप हों | इसी प्रकार मुसलमानों के अपने कर्म आवश्यक नहीं कि इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार हों | हो भी सकते हैं और नहीं भी | जहाँ तक बदलाव की बात है , तो बदलाव में वास्तविक धर्म कहाँ रह जाता है ?
 तवलीन जी की बात को स्वीकार करने का मतलब है , गलत कृत्यों को धर्म से जोड़ना ! इसे किसी भी धर्म से संबद्ध नहीं किया जा सकता | जहाँ तक इस्लाम की बात है , तो इसकी शिक्षाएं मानवता के लिए सदा कल्याणकारी एवं रहमत हैं |   इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है। महादयालु , कृपाशील अल्लाह ने फिर भी इन्सानों पर कृपा दृष्टि की और अपने अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ]  को भेजा | आप [ सल्ल . ] के द्वारा इस्लाम की पूर्ण और प्रमाणिक शिक्षा पेश की | इस्लाम की शिक्षाओं में सर्वप्रथम शिक्षा यह है कि अल्लाह एक है और केवल उसी की बन्दगी की जानी चाहिए | इसकी शिक्षाएं इंसानियत के लिए सर्वथा हितकारी - कल्याणकारी हैं | ये किसी एक समुदाय या कौम की सम्पत्ति न होकर सार्वभौमिक और सर्वजन की सम्पत्ति हैं | अतः यह सार्वजनिक , जगतव्यापी एवं सर्व कल्याणकारी धर्म है | सहज रूप से अल्लाह की प्रसन्नता , सामीप्य एवं लोक - परलोक की  सफलता प्रत्येक आस्थावान मनुष्य को अभीष्ट है | यह उसी एक जीवन - प्रणाली द्वारा संभव है , जो मानव - जाति के संगठन को अस्त - व्यस्त नहीं करती एवं उसके विचार - व्यवहार को द्वंदात्मक संघर्ष में नहीं ग्रस्त करती तथा जो आख़िरकार मानव - प्रकृति और जगत - प्रकृति से नहीं टकराती | यही इस्लामी जीवन - प्रणाली है | 
    

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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