Dec 28, 2014

APCR के सेक्रेटरी डॉ . शकील अहमद से बातचीत

असुरक्षा , बेरोज़गारी से त्रस्त मुसलमान गुजरात छोड़ने को मजबूर  

लगभग बारह साल पुराने गुजरात दंगों का दंश अभी तक बरक़रार है | हज़ारों विस्थापित बदहाली का जीवन बिताने के लिए अभिशप्त हैं | कोई उनका पुरसानेहाल नहीं है | कुछ मानव हितकारी संगठन गाहे - बगाहे उनकी कुछ मदद ज़रूर कर देते हैं , जो नाकाफ़ी है | यह हक़ीक़त भी है कि जब सरकार की ओर उनकी ओर ध्यान न हो , तो ये कोशिशें लंबे समय तक प्रभावी रूप से नहीं जारी रह सकतीं |
नतीजा यह है कि आज भी गुजरात के मुसलमान तरह - तरह की समस्याओं के शिकार हैं | उनके मौजूदा हालात पर ' कान्ति ' के संपादक डॉ . मुहम्मद अहमद ने एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स [ APCR ] के सेक्रेटरी एवं  इस्लामिक रिलीफ़ कमेटी , गुजरात के प्रभारी तथा जमाअत इस्लामी हिन्द , गुजरात के अध्यक्ष डॉ . शकील अहमद से बातचीत की | प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश -
सवाल - 2002 की गुजरात हिंसा के विस्थापितों के वर्तमान हालात कैसे हैं ? क्या वे पहले की तरह सामान्य जीवन जी पा रहे हैं ?
जवाब - अभी 38 - 40 हज़ार विस्थापित मुसलमान ऐसे हैं , जिन्हें मजबूरन कैंपों में रहना पड़ रहा है |साथ ही लगभग इतने ही लोग और हैं , जो कैंपों में न रहकर जहाँ - तहां रहते हैं , लेकिन अपने अस्ल घरों को वापस नहीं जा पाए हैं | इनकी अनगिनत समस्याएं हैं | इनमें से जो श्रमिक वर्ग से संबंध रखते हैं , वे अपने काम पर इसलिए लौट नहीं पा रहे हैं , क्योंकि अब उन्हें काम नहीं मिल पाता | जिन विस्थापितों के पुश्तैनी घर और अन्य जायदादें हैं , वे इतने लंबी अवधि के बाद घर इसलिए नहीं लौट पा रहे हैं , क्योंकि वहां पहले जैसा सद्भावपूर्ण माहौल नहीं है | लोगों की तरफ़ से रहने के लिए उटपटांग शर्तें अलग से रखी जाती हैं , जिन्हें मानना मुमकिन नहीं होता | ऐसी भी शिकायतें मिली हैं कि मुसलमानों के न रहने के कारण उनकी कुछ कब्रिस्तानों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया है |
रही बात उनके सामान्य जीवन की , तो यह अभी तक संभव नहीं हो पाया है | कैंपों में रह रहे विस्थापितों की बड़ी दयनीय दशा है | साफ़ पानी , हवा , सफ़ाई - सुथराई का घोर अभाव है | गंदगी का साम्राज्य है | जिन आराजी पर कैंप बने हैं , उनमें से कुछ की मिल्कियत पर सवालिया निशान लगाये जा रहे हैं |    
सवाल - इनकी और गुजरात के अन्य मुसलमानों की रोज़गार की स्थिति क्या है ?
जवाब - रोज़गार की बड़ी दयनीय और अफ़सोसनाक स्थिति है | मगर विस्थापितों की मुश्किलें ज़्यादा हैं | वस्तुस्थिति यह है कि लोग यहाँ से पलायन करने को मजबूर हैं | आज गुजरात के मुसलमान इस दिशा में सोचने को अभिशप्त हैं कि देश से बाहर जाकर रोज़गार से जुड़ा जाए या कम से कम देश में गुजरात छोड़कर अन्यत्र रहा जाए |
सवाल - क्या गुजरात में सांप्रदायिक सद्भावना पहले से बढ़ी है ?
जवाब - नहीं , ऐसी बात नहीं है | सामान्यतः लोगों को अपने किये पर कोई ग्लानि नहीं है | वे अपने दुष्कर्मों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं | हालत यह है कि राजकोट जहाँ पर गुजरात कांड के दौरान हिंसा की घटनाएं नहीं घटीं , वहां भी सद्भाव का माहौल बिगड़ा हुआ है | राज्य की कमोबेश यही स्थिति है , लेकिन राजकोट में भी कोई मुसलमान किसी गैर मुस्लिम की ज़मीन - जायदाद नहीं खरीद सकता | 
सवाल - वर्तमान समय में गुजरात में मुसलमानों के प्रति सुरक्षा का क्या माहौल है ? दूसरे शब्दों में राज्य में क्या मुसलमान अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं ?
जवाब - सब चिंतित रहते हैं | राज्य से बाहर के मुसलमान भी यहाँ नौकरी नहीं करना चाहते | मजबूरी में करते हैं | अभी पिछले दिनों बिहार के एक सज्जन को अपने बेटी - दामाद से मिलने अहमदाबाद आना था | वे सुरक्षा के प्रति इतने चिंतित थे कि बार - बार फोन करके हाल मालूम कर रहे थे | मुसलमानों में असुरक्षा की भावना आम बात बन गयी है | 
सवाल - राज्य के मुसलमानों का वर्तमान में शिक्षा के प्रति क्या सरोकार है ?
जवाब - वे पहले के मुक़ाबले शिक्षा के प्रति अवश्य आकृष्ट हुए हैं , लेकिन अफ़सोसनाक बात यह है कि पब्लिक स्कूलों में मुसलमान बच्चे - बच्चियों को दाख़िला नहीं मिल पाता | पक्षपात आम है |
सवाल - राज्य की राजनीति पर कुछ प्रकाश डालिए ? क्या सेकुलर होने का दावा करनेवाली कांग्रेस मुसलमानों के सामान्य हितों के साथ है ?
जवाब - हाल के उपचुनावों से उसका अस्तित्व फिर सामने आया है | लेकिन लगता है कि सांप्रदायिक कार्ड से ही यह संभव हो पाया है | कांग्रेस में एक बड़ी संख्या ऐसी है जो भाजपा के हिंबेहतरी के लिए ज़रुरी है कि उसके सदस्यों के चरित्र और किरदार को ऊँचा उठाया जाए | जो नवयुवक अपने कैरियर के सिलसिले में जागरूक हैं , उन्हें समाज - निर्माण के कार्यों के प्रति भी ध्यान देना चाहिए | हमें समाज के अन्य बदहाल लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए | सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा उठाने की कोशिश करनी चाहिए | इस सिलसिले में नागरिक विकास केंद्र का गठन किया दुत्व के एजेंडे को उचक लेने में यक़ीन रखती है | इस विषम स्थिति में मुसलमानों के लिए उसके पास कहाँ जगह बचती है | वह मुसलमानों के हितार्थ कुछ बोलने से परहेज़ करती है | 
सवाल - आपकी दृष्टि में गुजरात की बदली हुई प्रतिकूल परिस्थिति से उबरने के लिए मुसलमानों को क्या - क्या करना चाहिए ?
जवाब - इस सिलसिले में हम एक सर्वे कर रहे हैं | लोगों के सामने दस सवाल रखे गये हैं | उन्हें लिखकर जवाब देना है | यह काम अंतिम चरण में है | मेरा मानना है कि किसी भी समाज की गया है | मुसलमानों को अपने स्कूलों के स्तरीकरण की ओर भी ध्यान देना चाहिए और उच्च शिक्षण संस्थान भी क़ायम किये जाने चाहिए | 
            

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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