Nov 8, 2014

आस्था का सवाल ?

आस्था का सवाल ?
विदेशों में जमा काले धन की वापसी का मसला अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आस्था का सवाल बन गया है | अपने ' मन की बात ' बताते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर सही दिशा में बेहतर काम कर रही हैं। कालाधन वापस लाना उनकी आस्था का सवाल है और इस बारे में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी। पाई-पाई वापस लाया जाएगा , लेकिन यह कालाधन कितना है, इसका सही अनुमान सरकार के पास नहीं है। मोदी जी की इसी बात के अनुवर्तन में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि यह सुनिश्चित करने के प्रयास होने चाहिए कि कोई भी अवैध बैंक खाता अस्तित्व में ही ना आए और उम्मीद जतायी कि ऐसा वर्तमान सरकार के तहत होगा। 
सभी जानते हैं कि काले धन के ख़िलाफ़ पिछली यूपीए सरकार ने भी काफ़ी हो - हल्ला लिया था | उसने  21 मई 2012 को काले धन पर श्वेतपत्र जारी किया था , जिससे यह लगा था कि यूपीए सरकार काले धन की समस्या से निबटने के प्रति गंभीर है | वर्तमान राष्ट्रपति एवं  तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश इस दस्तावेज़ में भ्रष्टाचार के मामलों की तेज़ी से जाँच और दोषियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के लिए जल्द से जल्द लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं का गठन किए जाने की बात कही गयी थी | तत्कालीन वित्तमंत्री ने आयकर विभाग में अभियोजन पक्ष को मज़बूत बनाने और प्रत्यक्ष कर क़ानूनों व नियमों को युक्तिसंगत बनाने की ओर इशारा करते हुए त्वरित अदालतों के गठन एवं अपराधियों को कड़ी सज़ा के प्रावधानों का समर्थन किया था |
 कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में किसी आर्थिक अपराधी का नाम नहीं लिया गया था और न ही इस बारे में कोई जानकारी दी गयी थी कि दरअसल कितना काला धन विदेशों में है | सरकार ने इस सिलसिले में अन्य एजेंसियों के आकलन शामिल किए थे | उल्लेखनीय है कि यूपीए सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए कम से कम उन उपायों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया , जिनको अपनाने की बात श्वेतपत्र में कही गयी थी | 
कुछ आर्थिक जानकारों का मानना है कि यह हल्ला - गुल्ला भी पूंजीपतियों के फ़ायदे के लिए किया जाता है , ताकि वे अपने काले धन को समेट सकें | ऐसा हुआ भी है | पूंजीपति अपने काले धन को विदेशी बैकों से लगातार सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने में व्यस्त हैं | एक आर्थिक चिंतक का कहना है कि लोग बेमतलब सरकार पर शक कर रहे हैं कि सरकार को साँप सूँघ गया ! हो सकता है कि काले धन को ही साँप सूँघ गया हो, इसलिए अब वह किसी विदेशी बैंक में दिख नहीं रहा है !
काले धन की वापसी को लेकर मोदी सरकार से जनता की बड़ी उम्मीदें हैं | इस सिलसिले में सरकार के पास तो बस एक लिस्ट थी, जो उसे पिछली सरकार से मिली थी। 
सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने अपना काम सँभालते ही जून में एसआईटी बना दी और लिस्ट उसे सौंप दी ! इस क़दम का लोगों ने स्वागत किया | छह महीने बाद गत 29 अक्तूबर 2014 को  सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने बड़ी ना-नुकुर के बाद फिर वही पुरानी लिस्ट कोर्ट में जमा कर दी। वाया सुप्रीम कोर्ट वही लिस्ट फिर से एसआईटी के पास पहुँच गयी !
इस बार हुआ सिर्फ़ इतना है कि अब ब्लैक लिस्ट की पोल खुल चुकी है | यही कि लिस्ट में आधे तो एनआरआई ही हैं, जिन पर देश के टैक्स कानून तो लागू ही नहीं होते | बाकी बची लिस्ट में बहुत-से खातों में एक दमड़ी भी नहीं है। सारा पैसा बरसों पहले ही कहीं और ठिकाने लगाया जा चुका है। बाकी बचे कुछ खातों में कुछ तो कानूनी रूप से बिल्कुल सही बताये जा रहे हैं, कुछ पर कार्रवाई होकर पहले ही जुर्माना वगैरह वसूला जा चुका है और जो बचे-खुचे ‘काले’ खाते हैं भी, उनमें कुछ ज्यादा बड़ी रकम नहीं है ! तो फिर किस बात के लिए आस्था का सवाल खड़ा किया जा रहा है ?

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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