Nov 8, 2014

लाजपत नगर पोस्ट आफिस में जबरन दिए जा रहे प्रतिबंधित नोट

रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने उन नोटों के लेन  - देन पर रोक लगा रखी है , जो 2005 से पूर्व जारी किये गये थे और जिन पर सन अंकित नहीं है | एक अप्रैल 2014 से इन्हें सिर्फ़ बैंकों में वापस किया जा सकता है | इसके लिए भी आवश्यक है कि बैक में एकाउंट हो | मगर नई दिल्ली के लाजपत नगर स्थित पोस्ट आफिस इन नोटों को लेने के लिए उपभोक्ताओं को बाध्य कर रहा है और न लेने पर डाक कर्मी अशिष्टता पर उतर आते हैं | मैंने विगत पांच नवंबर को उक्त पोस्ट आफिस से अपने एकाउंट से बारह हज़ार रुपये निकाले , जिसमें एक - एक हज़ार के चार नोट 2005 के पूर्वकाल के थे , जिन्हें बदलने के लिए विंडो पर मौजूद महिला डाककर्मी महोदया से जब मैंने निवेदन किया , तो वे भड़क उठीं और कहा कि सब नोट सही हैं | अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुम्हें किसने बता दिया कि जिन नोटों पर सन मुद्रित नहीं है , वे नोट व्यावहारिक चलन से बाहर हैं | मैंने उन्हें रिज़र्व बैंक की हिदायत का हवाला दिया , फिर भी उन्होंने सिर्फ़ एक हज़ार के एक नोट के पांच - पांच सौ कर दिए , जिनमें भी एक पांच सौ का नोट 2005 से पूर्व का था | उन्होंने शेष तीन हज़ार के साथ ही उस पांच सौ के नोट को वापस लेने से इन्कार कर दिया | यह भी साफ़ कह दिया कि जो नोट उपलब्ध हैं , वही मिलेंगे | उन्होंने कहा ' घर से लाकर थोड़े ही दूंगी | ' डाक विभाग के उच्च अधिकारियों से अनुरोध है कि प्रतिबंधित नोट उपभोक्ताओं को न प्रदान करें और कर्मचारियों को निर्देश दें कि उपभोक्ताओं से सदा शिष्ट व्यवहार करें |
- मुहम्मद अहमद 
संपादक ' कान्ति ' साप्ताहिक / मासिक 
D- 314 ,दावत नगर , अबुल फज्ल इन्क्लेव 
जामिया नगर , नयी दिल्ली  - 110025

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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