Aug 23, 2014

' हिन्दू ' शब्द में धर्म विशेष के अनुयायी होने का बोध

भारत बहुलवादी देश है, इस प्रमुख विशेषता को 

खत्म करने की कोशिश निंदनीय एवं अनुचित   
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर उलटबांसी छेड़ी है | उन्होंने विगत दस अगस्त को भुवनेश्वर [ ओडिशा ] में कहा कि अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो फिर हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिन्दू क्यों नहीं हो सकते।उड़िया भाषा के एक साप्ताहिक पत्रिका के स्वर्ण जयंती समारोह में भागवत ने कहा, 'सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश में रहने वाले इस महान सस्कृति के वंशज हैं।' उन्होंने कहा कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है और किसी भी ईश्वर की उपासना करने वाला अथवा किसी की उपासना नहीं करने वाला भी हिंदू हो सकता है। स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि किसी ईश्वर की उपासना नहीं करने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति नास्तिक है, हालांकि जिसका खुद में विश्वास नहीं है, वह निश्चित तौर पर नास्तिक है। संघ प्रमुख ने यह भी कहा, ''केंद्र में भाजपा के नेतृत्त्व वाली राजग सरकार के गठन का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि लोगों को जाता है क्योंकि परिवर्तन उनकी इच्छा के चलते संभव हो पाया | '' भागवत ने कहा, ''कुछ लोग जीत का श्रेय पार्टी को दे रहे हैं जबकि अन्य लोग इसका श्रेय व्यक्तियों को दे रहे हैं , लेकिन इससे पहले भी संगठन और पार्टी थी और इसलिए व्यक्ति भी थे | उस समय क्या हुआ था? यह जनता है जो चुनाव के दौरान बदलाव चाहती थी और जिसने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया | '' उल्लेखनीय है कि इस बयान के एक दिन पहले ही दिल्ली में हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की कार्यकारिणी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी की जीत का श्रेय अमित शाह को दिया था | अब इस सिलसिले में आर एस एस ने अपने प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर सफाई दी है | आरएसएस के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने कहा है कि मोहन भागवत के बयान को नरेंद्र मोदी के बयान से जोड़कर न देखा जाए | मोहन भागवत के इस बयान को नरेंद्र मोदी द्वारा की गई अमित शाह की तारीफ से न जोड़ा जाए | वैद्य ने कहा कि मोहन भागवत ने जो जनता को शासन बदलने का क्रेडिट दिया है वह बात पहले भी आरएसएस के अलग-अलग फोरम में कर चुके हैं | उन्होंने कहा, ''एक पार्टी के अंदर अगर नरेंद्र मोदी किसी की तारीफ करते है , तो वह उनके पार्टी के अंदर का performance assessment है. साथ ही अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे , जहां मिली सीटों का बीजेपी की जीत में बड़ा सहयोग है | इसलिए अपनी पार्टी के अंदर नरेंद्र मोदी का ऐसा कहना और भागवत जी का पब्लिक मीटिंग में कुछ कहना इनको जोड़ा नहीं जा सकता |'' उन्होंने कहा कि बस दोनों ने अलग-अलग बात एक ही समय में कही ये सिर्फ अनुषांगिक है | सच है कि मोहन भागवत के ताज़ा बयान में सबसे विवादकारी तत्व उनका ' हिंदुत्व ' संबंधी है , जिसमें उन्होंने सावरकर के उस दर्शन को आगे बढ़ाया था कि भारत में रहनेवाले सभी लोग हिन्दू हैं | उनकी इस बात पर भारतीय समाज के कई प्रबुद्ध जनों ने भागवत के बयान कि तीखी आलोचना करते हुए कई सवाल खड़े किये हैं , जिनमें ख़ास है कि क्या उन्होंने संविधान पढ़ा है और क्या उनका वास्तव में उसमें विश्वास है। 

देश के मुसलमानों के प्रमुख संगठन जमाअत  इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब नुसरत अली ने कहा है कि इस आशय का बयान गलत और भ्रमकारी है कि देश के निवासी हिन्दू हैं | उन्होंने कहा कि भारत बहुधार्मिक , बहुसांस्कृतिक और बहुलतावादी देश है , अतः यहाँ के निवासियों को हिन्दू कहने का दुराग्रह गलत है ,  संविधान विरोधी है और अविवेकपूर्ण है | उन्होंने कहा कि देश के मुसलमानों को इंडियन , भारतीय और हिन्दुस्तानी तो कहा जा सकता है , लेकिन हिन्दू नहीं कहा जा सकता , क्यों इससे धर्म विशेष की पहचान , बोध और भान होता है | भाजपा नेता विनय कटियार ने कहा, ‘‘उनका (भागवत) हिंदु का तात्पर्य हिंदुस्तानी था। उन्होंने लोगों की धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप करने की बात नहीं की।’’ देश की प्रमुख प्रतिपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता मनीष तिवारी ने कहा कि भागवत को अच्छी सलाह दी जाती है कि वे देश का  संविधान पढ़ें , जिसमें विशेष तौर पर कहा गया है कि इंडिया भारत है, राज्यों का संघ और उसमें कहीं भी ‘‘हिंदुस्तान’’ का उल्लेख नहीं है। माकपा के सीताराम येचुरी ने कहा कि भागवत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे संविधान में विश्वास करते हैं। हमारे संविधान में देश भारत हैं, हिंदुस्तान नहीं।’’ जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत अपने विश्वास की बदौलत ही इतनी दूर आया हैं और उसका भविष्य इसी रास्ते में है। बसपा प्रमुख मायावती ने भागवत को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि उन्हें संविधान का ‘‘उचित ज्ञान’’ नहीं है।उन्होंने कहा कि ‘‘जब अंबेडकर जी (भीमराव अंबेडकर) ने संविधान लिखा तो उन्होंने यह बात ध्यान में रखी कि हमारा देश में विभिन्न धर्मों का पालन करने वालों लोग रहते हैं। इसलिए नाम भारत दिया गया | ' हिंदुस्तान ' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया। संघ प्रमुख को संविधान की उचित जानकारी नहीं है। उन्हें उसका अध्ययन करना चाहिए और उसके बाद कोई टिप्पणी करनी चाहिए | आर्कडायोसिस ऑफ दिल्ली के फादर सविरीमुत्तु ने भागवत की टिप्पणी पर चिंता जताई और कहा कि भारत एक बहुलवादी देश है लेकिन संघ प्रमुख ने सभी को एक छतरी में लाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारा देश महान है जो कि एकता और विविधता के लिए जाना जाता है, अब आप एक देश, एक धर्म, एक संस्कृति बनाने का प्रयास कर रहे हैं | सभी को एक छतरी में लाने का प्रयास कर रहे हैं जो कि सही नहीं है।’’ वास्तव में ' हिन्दू ' शब्द से एक धर्म विशेष का बोध होता है | अतः इस प्रकार कि कोशिश निंदनीय है |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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