Aug 23, 2014

राहुल गाँधी ने दुखती रग पर हाथ रखा

 महिला - सम्मान के लिए मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत 

कांग्रेस अपनी हार से तिलमिलाई हुई है | उसके सभी नेता अपने पुराने जनाधार की खोज में ऊलजलूल बयानबाज़ी पर भी आमादा दिख जाते हैं | वे जनता के बीच अपनी पकड़ बहाल करने के लिए कुछ आयोजन भी कर डालते हैं | ऐसे ही एक आयोजन महिला कांग्रेस का हुआ | विगत 20 अगस्त को दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में राजीव गांधी की 70 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित महिला कांग्रेस के कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने विवादस्पद किन्तु यथार्थवादी बयान दिया , लेकिन इसी मौक़े पर एक अनुभवी कांग्रेसी मणि शंकर अय्यर ने मोदी विरोध में यहाँ तक कह दिया कि ' यदि आप सार्वजनिक जीवन में सक्रिय ऐसी महिलाओं को कांग्रेस में लाते हैं , तो मोदीजी को कल तक गाँधी नगर जाना पड़ेगा और फिर हम उन्हें समंदर में पहुंचा देंगे | ' इससे पूर्व वे मोदी को कांग्रेस सम्मेलनों में चाय बेचने की मुफ्त राय भी दे चुके हैं| इस वर्ष के आम चुनाव प्रचार के दौरान भी अय्यर ने मोदी को ' नया लड़का ' की उपाधि दी थी और कहा था कि जोश में आकर इसकी जुबान फिसल जाती है ! राहुल गाँधी ने एक कडुई सच्चाई उजागर करते हुए कहा कि जो लोग आपको माता और बहन कहते हैं, जो मंदिरों में मत्था टेकते हैं, देवी की पूजा करते हैं, वही बसों में आपके साथ छेड़छाड़ करते हैं | उन्होंने कहा कि समाज में महिला विरोधी मानसिकता इस कदर व्याप्त है कि पूरे देश में हर महिला को दबाया जाता है | उन्होंने कहा कि समाज महज कानून से नहीं बदलता है | समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने की जरूरत है| जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी तब तक समाज को बदलना आसान नहीं है| कांग्रेस के युवा नेता की इस बात से इन्कार नहीं कि समाज में आमूलचूल परिवर्तन हेतु सोच में बदलाव लाना एक बड़ी चुनौती है , लेकिन राहुल गाँधी ने महिला अनुकूल मानसिकता के निर्माण की ज़िम्मेदारी स्वयं महिलाओं पर डालकर अपने संभाषण का गला घोंट डाला | उन्होंने बलात्कार और महिला अत्याचार की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कमी सोच की है | पुलिस और क़ानून से यह सब ठीक नहीं होगा | इसे महिलाएं ही ठीक कर सकती हैं | पुरुषों की सोच वे ही बदल सकती हैं |बाबा राहुल के इस बयान के विपरीत उनकी माँ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने पिछले वर्ष मार्च में इस आशय का बयान दिया था कि देश में महिलाओं के साथ बलात्कार और हिंसा की लगातार हो रही घटनाओं से हमारे सिर शर्म से झुक गए हैं |  उन्होंने इनके उपाय के तौर पर घोषणा की थी कि कन्या भ्रूणहत्या और महिलाओं के प्रति बढ़ रही चिंताजनक घटनाओं पर क़ाबू पाने के लिए जल्द ही कड़ा क़ानून बनाया जाएगा |  वास्तव में महिलाओं के प्रति आपराधिक घटनाओं में तेज़ी आई हुई है या यूँ कहें कि 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्षीया ज्योति की गेंगरेप के बाद हुई हत्या की हृदय विदारक घटना के बाद वे घटनाएं भी सामने आ जाती हैं , जो पहले दब - दबा जाती थीं | देश में बलात्कार की रोज़ाना अनेक घटनाएं घटित हो रही हैं | कुल मिलाकर स्थिति बिगड़ती जा रही है और महिलाओं का मान - सम्मान धूल - धूसरित हो रहा है
यह हकीक़त भी लोगों को पता है कि इन घटनाओं के साथ ही  कन्या - भ्रूण हत्या और विभिन्न रूपों में महिला - शोषण जारी है ! आज इधर - उधर की बातें बहुत की जा रहीं हैं | महिला - दिवस भी मनाया जाता है ... हर साल बड़े धूम - धाम से आलमी सतह पर .... पर महिला आज भी बहुल भावना और विचार के यथार्थ धरातल पर दोयम दर्जे पर है | उसके प्रति सामाजिक सोच में दोहरापन मौजूद है , यानी महिला होने के कारण वह अपने नैसर्गिक एवं फ़ितरी अधिकारों से वंचित है | अभी पिछली सदी में महिलाओं के प्रति जागरुकता का परिचय देते हुये अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने आह्वान किया और 8 मार्च का दिन महिलाओं के सशक्तीकरण के रूप में मनाया जाने लगा | सबसे पहले 28 फरवरी 1909 ई. को अमेरिका में यह दिवस मनाया गया, लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी शुरुआत की गई थी, वह बहुत पहले ही खत्म हो गया था | बस औपचारिकता अब तक बाक़ी है | आज दुनिया के सभी तथाकथित विकसित और विकासशील देशों में भी महिलाओं को लेकर लगभग एक जैसी दुखद  स्थिति बनी हुई है | भौतिक रूप से समाज और देश ने भले ही खूब तरक्की कर ली हो, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक नहीं है | सृष्टि में उसकी रचना भी उन्हीं गुणों और तत्वों के आधार पर हुई है, जिससे पुरुष बना है, किन्तु सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से महिला अभी भी न्याय की राह तक रही है |  उसे न्याय नहीं मिल सका है |  सामाजिक, आर्थिक आदि स्तरों पर महिलाएं आज भी बहुत पिछड़ी हैं | कल्पना तो यह भी गई  थी कि हमारे सामाजिक नजरिये में व्यापक बदलाव आयेगा और समाज अपने अभिन्न अंग को स्वयं के बराबर का दर्जा दे सकेगा, लेकिन ऐसा केवल पुस्तकीय ज्ञान और मंचीय भाषण तक सीमित होकर रह गया | ऐसे में यह विचार करना होगा कि साल में एक दिन महिलाओं के विषय में चिन्ता करना क्या पर्याप्त है या हमें उनके प्रति बाकी दिनों में भी चिन्ता करनी  चाहिये | संबंधों की बुनियाद पर आज किसी भी महिला को दहेज की दहलीज पार करनी पड़ती है , अन्यथा उसके साथ जो हश्र होता है वह किसी से छिपा नहीं है | हकीक़त यह है कि आज शिक्षा का प्रतिशत बढऩे के साथ ही नैतिकता का स्तर काफी गिरा है | दहेज  के कारण हत्याएं, मुकदमेबाजी, तलाक, बलात्कार जैसी घटनाओं ने तो मानवता के मुख पर कालिख ही पोत दी है |  बिना किसी पूर्वाग्रह के बात करें तो शहरों की स्थिति बड़ी नाजुक है, जो जितना अधिक उच्च शिक्षित, बड़े सामाजिक दायित्व वाला है, वह उतना ही अनैतिक आचरण करते सुना - देखा जाता है | वास्तव में महिला - सम्मान की बात केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाती है | महिलाओं की मानसिक और वैचारिक स्थिति का यदि नैतिकता के आधार पर अध्ययन किया जाए तो ऐसे आंकड़े सामने आएंगे, जो हमारे सामाजिक खोखलेपन को रेखांकित करेंगे | राष्ट्रीय स्तर पर जारी एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि एशिया में प्रतिवर्ष 10 लाख से ज्यादा लड़कियों को वेश्यावृत्ति के धंधों में उतारा जाता है | यह आंकड़ा कोलकाता, दिल्ली आदि महानगरों में ज्यादा है | इसी प्रकार से विदेशों में भारत से भेजी जाने वाली घरेलू कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी लज्जास्पद है | अखबार और टेलीविजन के पर्दे पर जब कभी कोई महिला यदि रोते बिलखते अपनी पीड़ा लेकर आती है , तब हम सामाजिक न्याय के झंडे उठा लेते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कितनी जिन्दगियां सिसकते आंसुओं के सैलाब में अपना गुजर कर रही हैं. उनका तो कोई पुरसानेहाल नहीं हैं | अतः जरूरी है कि सामाजिक संदर्भों में हम महिलाओं  के प्रति अपनी दृष्टि को और व्यापक , पारदर्शी और उदार बनाएं |



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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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