Jun 17, 2014

स्टंटबाज़ों पर कब लगेगी रोक ?

स्टंटबाज़ों पर कब लगेगी रोक ?

- डॉ . मुहम्मद अहमद
पिछले कुछ साल से शबे-बरआत को मुसलमान युवकों द्वारा सडकों पर हुडदंग मचाने और मोटरसाइकलों से स्टंट करने के बढते चलन से परेशान मुस्लिम समुदाय इस बार इसे रोकने में नाकाम रहा | इस बार समुदाय के संभ्रांत और अन्य जिम्मेदार लोगों ने अवाम से अपील की थी कि वे शबे-बरआत को अपने बच्चों को मोटर साइकिल और स्कूटर न दें। साथ ही यह संदेश भी पहुंचाया था कि यह रात इबादत की होती है न कि शोर-शराबा करके उसमें खलल डालने या लोगों को परेशान करने की | दिल्ली पुलिस भी इस बार हुडदंग को रोकने के लिए खासी मुस्तैद नजर आ रही थी | पुलिस ने मस्जिदों के इमामों और अन्यों के साथ बैठकें की थीं | पर्चे बांट कर भी लोगों से अपील की थी , मगर ये सब कोशिशें आख़िरकार धरी की धरी रह गयीं |
शबे - बरआत को लेकर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस द्वारा किए गए कड़े इंतजामों के बावजूद राजधानी में कुछ ही घंटों में बाइकर्स ने ट्रैफिक नियम तोड़ने का रिकार्ड बना डाला। इस मौके पर बाइकर्स ने पूरी दिल्ली में जगह-जगह जमकर हुड़दंग मचाया और पुलिस तमाशा देखती रही। खास तौर पर उत्तर-पूर्वी जिले के सीलमपुर, न्यू उस्मानपुर, जाफराबाद और शास्त्री पार्क इलाकों में बाइकर्स ने कानून को ताक पर रखकर जमकर खतरनाक स्टंट किए और देर रातभर स्टंटबाजी का सिलसिला चलता रहा। हालांकि स्टंटबाजी के दौरान किसी को नुकसान पहुंचने की खबर नहीं है।
इस दौरान पुलिस ने 2884 वाहनों के चालान काटे। इस मौक़े पर  राजधानी में अलग-अलग साउथ, नॉर्थ, नॉर्थ-ईस्ट, सेन्ट्रल और नई दिल्ली जिलों में 182 जगहों पर पुलिस की विशेष तौर पर तैनाती की गई थी। 13 जून की  रात में सड़कों पर भारी भीड़ उतरी जिनमें बाइकर्स की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। नई दिल्ली जिले को छोड़ दें तो अन्य जिलों में देर रात तक बाइकर्स का हंगामा चलता रहा। पुरानी दिल्ली से दक्षिणी दिल्ली जाने वाले मथुरा रोड पर बेरिकेड नहीं थे। इसी रोड पर देर रात तक हंगामा चलता रहा जबकि प्रगति मैदान के पास कुछ बाइकर्स ने उत्पात मचाया।
 इसी तरह सीलमपुर,जामा मस्जिद, वजीराबाद रोड, रोहिणी, जीटी रोड, शास्त्री पार्क, जाफराबाद, सीमापुरी समेत मुस्लिम बहुल इलाकों में भी हंगामा हुआ। सूत्रों की माने तो बगैर हेलमेट के एक बाइक पर बैठे तीन-तीन युवकों ने खूब स्टंट किए। किसी ने बाइक पर लेट कर सवारी की तो किसी ने आगे-पीछे के पहिये को उठाकर स्टंट किया। वहीं इस बार इंडिया गेट पर बाइकर्स पुलिस की सख्ती के चलते स्टंटबाजी नहीं कर पाए।
पिछले साल जब उत्तराखंड में बाढ़ , भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से हज़ारों - हज़ार लोगों की ज़िंदगियाँ छिन गई थीं  | बहुत बड़ा क्षेत्र तबाह व बर्बाद हो गया | पीड़ितजनों के आंसू थम नहीं पा रहे थे , शबे बरआत पर कुछ मुसलमान नवजवान और लड़के  दिल्ली की सड़कों पर जश्न मनाते नज़र आ रहे थे ! यह वह अमल था , जिसकी इस्लाम में कोई सनद नहीं | हाँ , रमज़ान के आने से पूर्व ऐसा माहौल पैदा किया जाना चाहिए , जिसमें इस माह की बरकतों से फ़ायदा उठाना आसान हो जाए | लेकिन हुडदंग , शोरशराबा  और हंगामा पैदा करने को कोई कैसे समर्थन कर सकता है ?
पिछले शबे बरआत [ 24 जून ] को दिल्ली के इंडिया गेट पर हज़ारों बाइक सवारों ने करीब चार घंटे तक जमकर हुडदंग मचाया | ख़तरनाक स्टंटबाज़ियाँ कीं | पूरे इलाक़े को एक तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया | उन्होंने वहां से गुज़रनेवालों की परवाह नहीं की | हज़ारों की तादाद में उत्पात मचानेवालों के सामने पुलिसकर्मी असहाय और बेबस हो गए | पुलिस को इन पर काबू पाने में लगभग दो घंटे लग गए | जब बाइक सवार बेरिकेड तोड़ने लगे और उस पर वाहन से टक्कर मारने लगे , तो हुडदंगियों को खदेड़ने के लिए ज़िले के डी सी पी को भारी संख्या में पुलिस बल के साथ सड़कों पर पर उतरकर मोर्चा संभालना पड़ा था |
इस बार भी दिल्ली और देश के अन्य स्थानों पर भी हुडदंग का आलम रहा | यह रात शालीनता से पेश आने की रात है न कि सडकों पर उतर कर शोरगुल करने की | जो लोग ऐसा करते हैं और लोगों को परेशान करते हैं तथा अपनी जिंदगी को खतरों में डालते हैं वे  इस्लाम और मुसलमानों की छवि बिगाड़ते हैं | चांदनी चौक स्थित फतेहपुरी शाही मस्जिद के इमाम मौलाना मुफ्ती मुकर्रम का कहना है कि ‘‘शबे-बरआत तो असल में इबादत की रात है | इसमें कहां से आ गया बाजार जाना, सैर सपाटा करना, बाइक चलाना | यह वक्त की बर्बादी है और गुनाह है |
हमें अल्लाह से दुआ करनी चाहिए. चाहे हम मस्जिद में बैठें या घर में। हमें अपने गुनाहों और बीती जिंदगी में किए गए कर्मो का जायजा लेना चाहिए और अल्लाह से तौबा करनी चाहिए | उन्होंने कहा कि ‘‘मोहल्ला कमेटियां और मज़हबी लीडर युवाओं को बताएं कि शबे बरआत क्या है और उन्हें नेक कामों में लगाएं  उन्हें समझाएं कि ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए जिससे दूसरों को पेरशानी हो या खुद के लिए समस्या पैदा हो। मैं खुद पिछले 15 दिनों से इस काम में लगा हुआ हूं. मुझे उम्मीद है कि इस बार कुछ अच्छा असर पडेगा और हम इसी तरह लगे रहे तो साल दो साल में यह समस्या खत्म हो जाएगी | ’’

मुस्लिम नवजवानों के इस अमल को भर्त्सना के साथ उन्हें ऐसे असभ्य व अशालीन हरकतों के प्रति हतोत्साहित किया जाना चाहिए | यह इस्तिकबाल - ए रमज़ान नहीं है , बल्कि ऐसा कोई भी काम जो अशालीन और खुदा की बन्दगी से ख़ाली हो , इस्लामी हुक्म और आचार से बाहर है | वास्तव में इस्तिक़बाल - ए रमज़ान की विभिन्न सरगर्मियों के द्वारा मुस्लिम समाज में ऐसी फ़ज़ा पैदा की जा सकती है , जो नेकियों के लिए साज़गार हो और जिसमें बुराईयाँ मिटने लगें | अफ़सोस और तशवीश की बात यह है कि  रमज़ान से पूर्व उसके लिए जो मंसूबा बनाना चाहिए , वह हमारे समाज में अब कम ही नज़र आता है | हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए |   

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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