Jun 10, 2014

ज्ञानवापी मस्जिद और अखिलेश सरकार

ज्ञानवापी मस्जिद और अखिलेश सरकार

-डॉ . मुहम्मद अहमद
आम चुनाव ने अखिलेश सरकार की नींद हराम कर दी है | जिस गुजरात माडल को आये दिन कोसा जा था , उसके लिए उसी माडल को अपनाना अब ज़रुरी ही नहीं अनिवार्य हो गया है | अतः यह माना जा रहा है कि लगभग दो वर्ष दो माह पुरानी सरकार के लिए आनेवाले दिन अच्छे नहीं लग रहे हैं | समाजवादी पार्टी नई चुनावी रणनीति बनाने में जुटी हुई है |
अब वह धार्मिक कार्ड खेलने से तौबा करेगी , बल्कि धार्मिक अभियंत्रण पर पूरा - पूरा ध्यान देगी | सपा का यह ' अभियान ' भाजपा और बसपा के इस तरह के अनुप्रयोगों पर भारी पड़ेगा | सपा जिस धार्मिक अभियंत्रण पर काम कर रही है है , वह यह है कि काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए |
इस बार लोकसभा चुनाव में इसका राजनीतिक फायदा भले ही नहीं उठाया जा सका, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में यह 'धार्मिक-अभियांत्रिकी' अपना असर जरूर दिखाएगी। भारतीय जनता पार्टी बाबरी मस्जिद के साथ काशी  - मथुरा का विवाद राजनीतिक पटल पर उछालती और उसका फायदा उठाती रही है।
 अब भाजपा चूँकि केन्द्रीय सत्ता में है , इसलिए समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में  भाजपा के विस्तार को रोकने के लिए इस योजना को अमली शक्ल देने में जुटी है | काशी के सिलसिले में अखिलेश सरकार ने जो फार्मूला बनाया है, उससे संकेत मिल रहा है कि हिंदू या मुस्लिम समुदाय के लोगों को कोई आपत्ति नहीं होगी।
काशी विवाद के स्थायी समाधान के लिए प्रदेश सरकार काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के इर्द-गिर्द और उसकी व्यापक परिधि के सारे मकान और जमीनों का अधिग्रहण करने जा रही है। जिनके घर या जिनकी जमीनें ली जाएंगी उन्हें बाजार दर पर उसकी कीमत दी जाएगी। मंशा यह है कि मंदिर और मस्जिद के लिए आने-जाने वाले श्रद्धालुओं को जितनी मुश्किलों और आपसी तनाव का सामना करना पड़ता है, उसका हमेशा के लिए समाधान निकल आए। मंदिर और मस्जिद के पास के व्यापक इलाके को खाली कर मंदिर और मस्जिद के रास्ते अलग-अलग कर दिए जाएंगे।
मंदिर और मस्जिद के लिए अलग-अलग विशाल द्वार के निर्माण के साथ ही मंदिर-मस्जिद को भव्य बनाने का काम निर्बाध रूप से हो सकेगा। अत्यंत संकरे रास्ते और मंदिर मस्जिद के रख-रखाव को लेकर होने वाले कामों को लेकर जो दुश्वारियां पेश आती रही हैं। इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए प्रदेश सरकार के धर्मार्थ कार्य विभाग ने एक विस्तृत प्रस्ताव औपचारिक तौर पर मुख्यमंत्री को सुपुर्द किया था जिसे सरकार ने हरी झंडी दे दी और आगे की कार्रवाई भी तेज़ी के साथ शुरू हो गई है।
प्रदेश के धर्मार्थ कार्य विभाग एवं सूचना विभाग के सचिव नवनीत सहगल ने काशी विवाद हल करने की इस महत्वपूर्ण योजना की आधिकारिक पुष्टि की है । उन्होंने कहा कि योजना का विस्तृत प्रस्ताव सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, जिस पर मंजूरी के बाद इस पर काम तेजी से हो रहा है।
काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के चारों तरफ फैले नागरिक-बसाव को खाली कराने के लिए लोगों को उनके घरों की कीमतें दी जा रही हैं। इस योजना पर लोगों का समर्थन तो मिल रहा है, लेकिन पैसे की लालच में मालिकाना हक के कुछ विवाद भी खड़े किए जा रहे हैं, लेकिन सरकार उसका भी हल निकाल रही है। श्री सहगल ने उम्मीद जताई कि मंदिर और मस्जिद के रास्तों को अलग-अलग करने और विस्तार देने का काम भी शीघ्र ही शुरू हो सकेगा।
उल्लेखनीय है कि यह विवाद अब भी बना हुआ है | 11 अगस्त, 1936 को दीन मुहम्मद, मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद जकरिया ने स्टेट इन काउन्सिल में प्रतिवाद संख्या-62 दाखिल किया और दावा किया कि सम्पूर्ण परिसर वक्फ की सम्पत्ति है। 24 अगस्त 1937 को वाद खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील संख्या 466 दायर की गई लेकिन 1942 में उच्च न्यायालय ने इस अपील को भी खारिज कर दिया। कानूनी गुत्थियां साफ होने के बावजूद मंदिर-मस्जिद का मसला आज तक बना हुआ है | सपा इसे हल करने में सफल हो जाती है , तो यह उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी , जिसका उसे राजनीतिक लाभ भी मिलेगा |
दूसरी ओर मोदी ने काशी की ओर अर्थात उत्तर प्रदेश के विकास की ओर ध्यान देने की बात कही है , जिससे सपा में खलबली मची और इसे पार्टी अपने अस्तित्व से जोड़कर देख रही है | नये प्रधानमंत्री ने काशी में गुजरात के सरकारी नियंत्रण वाले अमूल दुग्ध उद्योग की शाखा खोलने का ऐलान किया है | कुछ अख़बारों में यह भी छपा कि काशी में अघोषित रूप से मिनी प्रधानमंत्री कार्यालय होगा |
इस स्थिति में अखिलेश सरकार विकास कार्यों की ओर खास ध्यान देगी | उत्तर प्रदेश विकास के मामले में ग्यारहवीं पंच वर्षीय योजना का लक्ष्य हासिल करने में पीछे रहा है | पिछले दस वर्षो में गुजरात के सकल घरेलू उत्पाद की औसत वृद्धि दर 10.1 प्रतिशत रही जो राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है। उप्र सरकार ने बारहवीं योजना की अवधि (2012-17) में सालाना दस फीसद की रफ्तार से आर्थिक विकास दर हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। नियोजन विभाग का आकलन है कि यह लक्ष्य हासिल करने के लिए कुल 16,70,000 करोड़ रुपये की ज़रूरत होगी।
इसमें से 71 फीसद यानी 11,84,000 करोड़ रुपये निजी क्षेत्र से हासिल करने की मंशा जतायी गई है, लेकिन जमीनी हकीकत देखते हुए यह निवेश हासिल कर पाना राज्य सरकार के लिए आसान नहीं है। ग्यारहवीं योजना के दौरान उप्र सरकार ने सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) के आधार पर 2,64,204 रुपये का निवेश हासिल करने का लक्ष्य तय किया था। इसके सापेक्ष योजना की अवधि में असल निवेश महज 42,942 रुपये ही हो सका था।

अखिलेश सरकार के लिए यह चिंता की बात है कि सवा दो वर्ष के कार्यकाल की उसकी कोई ख़ास उपलब्धि नहीं रही , जिसकी वजह से वह अपने प्रदेश को भाजपा के प्रभाव से ममता बनर्जी , नवीन पटनायक और जयललिता की भांति नहीं बचा पाई | अब अपने अस्तित्व की खातिर उसे कुछ करना ही पड़ेगा |

About the Author

मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

0 comments:

Post a Comment