May 18, 2014

मोदी सरकार के समक्ष चुनौतियाँ

मोदी सरकार के समक्ष चुनौतियाँ 
 
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी देश के नये प्रधानमंत्री होंगे | भाजपा के गठबंधन एनडीए को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल चुका है | देश के संसदीय इतिहास में तीस साल बाद किसी पार्टी के इतनी अधिक सीटें मिली हैं | भाजपा को पहली बार इतनी अधिक सीटें - उसकी आशा से बहुत अधिक सीटें प्राप्त हुई हैं |
भारत और दक्षिण अफ्रीका में एक ही समय केन्द्रीय सत्ता के लिए चुनाव हुए | दोनों देशों में लोकतंत्र हैं और दोनों देशों की समस्याएं लगभग एक जैसी हैं | वहां की सत्तारूढ़ एएनसी ने सत्ता विरोधी वेग के बावजूद लगातार पांचवी बार जीत दर्ज की है और राष्ट्रपति जैकब जुमा दोबारा सत्ता संभालने के लिए तैयार हैं। यह चुनाव अफ्रीका के अग्रनेता नेल्सन मंडेला के देहांत के बाद हुए होते तो स्वाभाविक था कि एएनसी को सहानुभूति लहर का लाभ मिलता। 
बावजूद इसके उसके वोट प्रतिशत में जो गिरावट आयी है, उस पर जैकब जुमा समेत तमाम लोगों को विचार करने की आवश्यकता है। राष्ट्रपति जुमा के पहले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के कई आरोप सरकार पर लगे। बुनियादी सुविधाओं के अभाव, बेरोजगारी जैसे मसलों पर देश में सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शन हुए।
 इकानामिक फ्रीडम पार्टी के युवा नेता जूनियस मलेमा, जो पहले एएनसी के यूथ लीग के अध्यक्ष थे और पार्टी से निकाले जाने के बाद 2013 में , ने सत्ताधारी पार्टी को कड़ी चुनौती दी। इसी प्रकार विपक्षी दल डेमोक्रेटिक एलांयस, जो मुख्यत: गोरों की पार्टी कही जाती है, की नेता हेलेन जिले ने पिछले कुछ सालों में अश्वेत लोगों के बीच अपनी अच्छी पकड़ बना ली है। 
सुश्री जिले पहले पत्रकार थींऔर अश्वेत नेता स्टीव बीको की मृत्यु का सच उन्होंने उद्घाटित किया था। वे केपटाउन की मेयर रही हैं। नशीली दवाओं के व्यापार, अपराध व बेरोजगारी पर अंकुश लगाने की सफलता ने उन्हें 2008 में वल्र्ड मेयर आफ द इयर का खिताब दिलवाया था। वे रंगभेद विरोधी आंदोलन से जुड़ी रही हैं। 
भारत में सत्ता विरोधी लहर और सत्ताधारियों द्वारा जनता की समस्याओं की अनदेखी के सबब सत्तारूढ़ दल को सत्ता त्यागने के लिए मजबूर होना पड़ा है | अतः यह सही है कि सरकार के भ्रष्टाचार और खराब काम-काज ने नरेंद्र मोदी के लिए लाल कालीन बिछा दिया। लेकिन सरकार को पार्टी अध्यक्ष सोनिया और उपाध्यक्ष राहुल ने कैसे नचाया, यह भी जगजाहिर है। यूपीए-1 में मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब प्रधानमंत्री के काम में सोनिया की दखलंदाजी के अनेक दृष्टांत देती है। 
राहुल गाँधी की जुबानी सरकार के फैसले को 'बकवास' और 'फाड़कर फेंक देने लायक' बताना भी दबाव बनाने का हिस्सा था | वैसे देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कड़े उपाय ज़रूरी थे , मगर यह काम सत्ता विरोधी लहर को कम से कम करके किया जा सकता था | क़दमों को जनविरोधी बनने से किसी हद तक रोका जा सकता था | इस सिलसिले में आधार की सब्सीडी रसोई गैस के लिए अनिवार्यता और सब्सीडी के सिलेंडरों को सीमित करने के क़दमों ने बड़ा गुल खिलाया | बढ़ती महंगाई ने कांग्रेस का बड़ा कबाड़ा किया | 
दूसरी ओर कांग्रेस अति दंभ का शिकार थी , क्योंकि यूपीए 2 उसकी गोदी में बैठे - बिठाये अनायास आ गया था , जिसकी कांग्रेसी अपेक्षा नहीं कर रहे थे | नई सरकार को इस तरह की गलतियों यानी जनविरोधी क़दमों से बचना होगा | 16 वीं लोकसभा के चुनाव सही मायने में पार्टी - आधार पर नहीं हुए | लोकतंत्र को धता बताकर व्यक्तिवाद चला | ख़ासकर मोदी , राहुल और केजरीवाल के नामों पर चुनाव लड़ा गया , जो लोकतान्त्रिक मूल्यों का साफ़ अवमूल्यन है | 
आरोप - प्रत्यारोप के दौर में विकास गुम हो गया | गुजरात माडल की जिसने भी चर्चा की , उसकी भद हुई , लिहाज़ा उसने चुप्पी साध रखने में ही अपनी समझी | ऐसे में पूरा चुनाव जनता की समस्याओं से कोसों दूर रहा | मतदान के अंतिम दिन महंगाई का तोहफ़ा अलग से दिया गया ! डीज़ल के दाम एक रुपये नौ पैसे बढ़ा दिए गये , मानो बस इसका इन्तिज़ार हो कि कब मतदान का अंतिम दिन आए और पूंजीपतियों को फ़ायदा पहुचाकर ख़ुद मालामाल हुआ जाए | 
वैसे महंगाई बढ़ाने की शुरुआत गुजरात के सरकार नियंत्रित अमूल दुग्ध उद्योग द्वारा मतदान के अंतिम चरण के दो दिन पहले ही दूध के दाम दो रुपये प्रति लीटर बढ़ाकर कर दी गयी थी | फिर मतदान के अंतिम दिन मदर डेयरी आदि ने अमूल की पैरवी की ! उल्लेखनीय है कि मोदी जी वाराणसी में भी अमूल उद्योग लगाने का ऐलान कर चुके हैं |
नरेंद्र मोदी तो अपने को उसी दिन से प्रधानमंत्री मान चुके थे , जिस दिन भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार बनाया था | उनका आत्मविश्वास तो देखते ही बनता है ! पिछले साल 15 अगस्त को उन्होंने बनावटी लालकिले से भाषण दिया | उनकी चुनावी रैलियां गोयबल्स से कम नहीं थीं | अपने भाषणों में वे अपने को चायवाला बताकर गरीब तबक़े का ध्यान खींचा ही , पूंजीपतियों के भी प्रिय बने रहे , जिसका सबूत शेयर मार्केट का सेंसेक्स देता रहा | एक्जिट पोल के लीक होते ही शेयर मार्केट में बहार आ गयी | ऐसा क्यों न हो !
मोदी जी ने बार - बार साबित किया है कि वे पूंजीपतियों के हितैषी हैं | मज़दूरों के शोषण पर जब रतन टाटा सिंगुर [ पश्चिम बंगाल ] से भगाए गये , तो उन्होंने टाटा को अहमदाबाद में नैनो के लिए 725 एकड़ जमीन दी | इस पर टाटा खुश हुए और उन्हें उनमें देश का भावी प्रधानमंत्री दिखा | इस आशय का टाटा ने बयान भी दिया | टाटा के इस ऐलान का अन्य कई पूंजीपतियों ने समर्थन किया | ऐसा क्यों न हो ? 
मोदी जी ने अपने शासनकाल में पूंजीपतियों को मात्र 900 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से दो लाख हेक्टेयर ज़मीनें जो दी हैं , उसके प्रति कृतज्ञता तो दिखानी ही थी | कहा जाता है कि इसके अतिरिक्त मोदी जी ने अदानी को बेहद सस्ते रेट पर बडौदा नगर के क्षेत्रफल से अधिक ज़मीनें उपलब्ध करायी हैं , लेकिन उनका यह क़दम उचित है , क्योंकि जो जमीनें उन्होंने दीं , वे अति बंजर हैं | मोदी जी पूंजीपतियों के उत्थान के लिए गुजरात में 13 विशेष निवेश क्षेत्रों के निर्माण  की दिशा में क़दम उठाया है | इसके लिए प्रत्येक विशेष निवेश क्षेत्र के लिए सौ किमी तक किसानों से ज़मीनें ली जाएँगी , जिसका किसान लगातार विरोध कर रहे हैं | 
विरोध करनेवालों को गुजरात पुलिस गिरफ्तार करके जेलों में डाल चुकी है | लालजी देसाई और सागर रबारी जैसे नेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं , लेकिन मोदी अपने फ़ैसले पर अटल हैं | बहुत - से जानकर मानते हैं कि मोदी की कार्यप्रणाली में फासीवादी पुट अधिक है , जिसकी वजह से देश के धर्म निरपेक्ष , मानवाधिकारवादी और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग आशंकित हैं | मोदी जी और भाजपा को यह आशंका दूर करनी होगी |  साथ ही देश का तेज़ी के साथ जनोन्मुखी सर्वसमावेशी विकास करना होगा | डालर को रोककर बढ़ती महंगाई पर काबू पाना होगा |
  इस बार के चुनाव परिणाम पर थोड़ा स्थिर होकर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत होगी। यह सच है कि चुनाव के पहले देश भर में एक कांग्रेस-विरोधी हवा चल रही थी। उसका प्रचार के प्रारंभिक दौर में विपक्ष की प्रमुख पार्टी भाजपा को लाभ मिलना तय था। लेकिन भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी को सामने लाकर इस पूरे दृष्यपट में एक गुणात्मक परिवर्तन का बीजारोपण किया। देखते-देखते एनडीए और भाजपा का कायांतर हो गया और वह सब एक व्यक्ति की, मोदी की पार्टी के रूप में बदल गया। साथ ही जिस राजग ने अपने प्रचार की शुरूआत भ्रष्टाचार-विरोधी, विकास-केंद्रित विपक्ष के गठबंधन के रूप में की थी, वह मतदान के वक़्त तक आते-आते सांप्रदायिक और जातिवादी विद्वेष की मोदी पार्टी में बदल गया।
 इस लम्बे प्रचार अभियान में मोदी और उनकी पार्टी का पूरा रवैया ऐसा रहा, जिससे वह विपक्ष की पार्टी प्रतीत ही नहीं होती थी। मोदी पार्टी ने धन की ताक़त का सबसे अधिक अश्लील प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस क़दर ख़ामोश हो गये जैसे देश का कोई प्रधानमंत्री ही न हो, और उनके इस रिक्त स्थान को नरेन्द्र मोदी और उनके जयगान में जुटे दरबारियों ने सिर्फ़ अपने शोर के बल पर चुनाव के पहले ही जैसे हथिया लिया। इस प्रकार, कांग्रेस-विरोधी माहौल से शुरू हुआ चुनाव कब और कैसे साम्प्रदायिकता बनाम धर्म-निरपेक्षता के चुनाव में, कब सामाजिक न्याय की एक और लड़ाई में बदल गया, किसी को पता भी नहीं चला। 
चुनाव नतीजों को देखकर कुछ टिप्पणीकार यह फरमा रहे हैं कि मुसलमानों ने मोदी का खुलकर विरोध किया और अपने वोटों को बर्बाद किया - प्रभावहीन बना लिया , ये दोनों बातें सच नहीं हैं | हाँ , यह सच है कि गुजरात - प्रकरण के चलते मोदी को सेकुलर लोग भी पसंद नहीं करते हैं , फिर यह मान लिया जाए कि देश से सेकुलर फैक्टर सिरे से गायब हो गया है , किसी भी रूप में सही नहीं होगा | यह सच है कि मोदी ने विकास की भी बातें बार - बार की हैं , हालाँकि वे इस पर अटल न रह सके | 
फिर भी वे मतदाताओं को जितना विश्वास दिला सके मुसलमानों और सेकुलर लोगों का उतना वोट वे पा भी सके | जहाँ विकास की बात होगी और उसमें गंभीरता दिखेगी , तो विकास के पक्ष में जनमत बनेगा ही | लेकिन नई सरकार को ख़ासकर अल्पसंख्यकों की आशंकाओं को ज़रूर दूर करना होगा | आशा की जानी चाहिए कि मोदी जी धर्म , मत और अन्य आग्रहों से ऊपर उठकर सिर्फ़ देश के विकास के लिए काम करेंगे , जैसा कि उन्होंने अपने चुनाव - प्रचार में बार - बार वादा किया है | वैसे मोटे तौर पर देश के समक्ष दस बड़ी चुनौतियां हैं - 
1 . देश की आर्थिक प्रगति को पक्षपातरहित होकर जनोन्मुखी और सर्वसमावेशी बनाना | इस सिलसिले में मनरेगा की समीक्षा और खाद्य सुरक्षा क़ानून को प्रभावी  ढंग से लागू करने जैसे क़दम उठाना , ताकि तेज़ रफ़्तार से आर्थिक प्रगति हो सके | डालर और चीनी हथकंडों से देश को हरहाल में बचाना होगा | 
2 . बिजली उत्पादन की ओर पर्याप्त ध्यान देना होगा , ताकि देश के बुनियादी ढांचे को मज़बूत बनाया जा सके | इस सिलसिले में निजीकरण और पूंजीवादी जाल से भी बचने की ज़रूरत है | नव एवं वैकल्पिक ऊर्जा क्षेत्रों को प्रोत्साहित किए जाने की भी आवश्यकता है |
3 .  नदियों को जोड़ने के व्यापक अभियान की ज़रूरत है , ताकि सिंचाई की ओर ध्यान देकर प्रगति को सुनिश्चित किया जा सके |
4 . पर्यावरण सुरक्षा के प्रति ठोस क़दम उठाना |
5 . अल्पसंख्यक समुदायों की उन्नति - प्रगति और उनकी धार्मिक - सांस्कृतिक पहचान की संरक्षा हेतु सकारात्मक क़दम उठाना | इस सिलसिले में हरहाल में सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखना और इसे बढ़ावा देना बहुत आवश्यक है |
6 . देश की सुरक्षा के लिए सामरिक आयुधों एवं संसाधनों की ओर समुचित ध्यान देना समय की आवश्यकता है |
7 . जनता की समस्याओं को कम करने के लिए बहुत - से क़दम उठाने की ज़रूरत है | बिजली , पानी , स्वास्थ्य , महंगाई से संबंधित समस्याएं हल करना सरकार की पहली प्राथमिकता बनती है |
8 . बेरोज़गारी को दूर करने के लिए ठोस और प्रभावी रणनीति बनाई जानी चाहिए |
9  .  भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगाना | यह विभिन्न समस्याओं की जननी है |
10 . अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की साख - इज्जत को और बढ़ाने की ज़रूरत है | इस सिलसिले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए | 
भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी सही फरमाते हैं कि मोदी जी ने काँटों भरा ताज पहना है | तिवारी जी भाजपा के नये सांसद हैं | वे भाजपा की आंतरिक हालत से भी वाकिफ़ हैं | पार्टी में गुटबंदी से कौन इन्कार कर सकता है , लेकिन नेताओं पर आर एस एस का अनुशासन का चाबुक उन्हें ज़रूर रोकेगा , जो स्थायी सरकार का मार्ग प्रशस्त करेगा |  
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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