May 18, 2014

नक्सलवाद - कठोर क़दम उठाएं

झीरम घाटी में फिर भयानक खूनखराबा

लचर राजनीति छोड़कर कठोर क़दम उठाएं

देश में बढ़ती नक्सल समस्या पर काबू पाने के लिए गत वर्ष 6 जून को नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हुए नक्सल हमले का जिक्र करते हुए कहा था कि इस तरह की हिंसा का हमारे लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। केंद्र और राज्यों को साथ मिल कर काम करने की जरूरत है ताकि सुनिश्चित हो सके कि इस तरह की घटना फिर से न होने पाए। उन्होंने कहा था कि माओवादियों के खिलाफ सक्रियता से सतत अभियान चलाने और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में विकास और शासन से जुडे मुद्दों के समाधान की दो-स्तरीय रणनीति को और मजबूत करने की जरूरत है। माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और खुफिया तंत्र मजबूत करने के प्रयासों के साथ ही हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे इलाकों में रहने वाले लोग शांति और सुरक्षा के माहौल में रह सकें और विकास के प्रयासों से उन्हें पूरा फायदा हासिल हो सके। आप देख ही रहे हैं कि प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर ध्यान नहीं दिया गया और  दंतेवाड़ा में 2010 में सीआरपीएफ के 76 जवानों के खूनी नरसंहार की यादें 11 मार्च 2014  को एक बार फिर ताजा हो गईं , जब लगभग 200 नक्सलियों के गिरोह ने एक बार फिर झीरम घाटी के उसी इलाके में सुरक्षाबलों पर हमला बोलकर 15 जवानों सहित 16 लोगों की ताबड़तोड़ गोलीबारी कर हत्या कर दी। नक्सलियों ने सुरक्षा बलों से 15 स्वचालित हथियार भी लूट लिए और तीन वाहनों में आग लगा दी। करीब तीन घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद वे मृत पुलिसकर्मियों के हथियार और गोला बारूद भी लेकर फरार हो गए। बताया जाता है कि दिनदहाड़े हुए इस हमले को दंडकारण्य जोनल कमेटी की दड़बा घाटी इकाई के रामन्ना-सुरिंदर-देवा की तिकड़ी ने अंजाम दिया है। यह हमला जिस स्थान पर हुआ है , वह इससे पहले पिछले वर्ष 23 मई को कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुए हमले से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर है। उस हमले में नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा सहित राज्य कांग्रेस के समूचे नेतृत्व का लगभग सफाया कर दिया था। इसी गिरोह ने पिछले हमले में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल और उनके बेटे और कर्मा सहित 25 लोगों की जान ली थी।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने घटना की निंदा की है। केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने घटना पर शोक जताते हुए कहा कि हम नक्सलियों से सीधी टक्कर लेंगे। नक्सली गतिविधियों से पूरी कठोरता से निपटा जाएगा और हम ऐसा करेंगे। इस प्रकार के बयान पहले भी दिए जाते रहे हैं , लेकिन सदा लापरवाही ही सरकार की अघोषित नीति रही है | नई दिल्ली में सीआरपीएफ के अधिकारियों ने हमले के लिए सुरक्षा चूक को भी जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने बताया कि सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस की 48 सदस्यीय संयुक्त टीम ने मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) का पूरी तरह उल्लंघन किया। यह टीम रोजाना निर्माण स्थल पर जा रही थी और एक ही रास्ते से जा रही थी। नक्सल रोधी अभियान में किसी एक ही रास्ते से बार बार न गुजरने के सिद्धांत का यहां उल्लंघन हुआ। वास्तव में यह सुरक्षा का इस्लामी सिद्धांत है , जिस पर पूरी दुनिया में अमल किया जाता है | ऐसा लगता है कि सुरक्षाकर्मियों की आवाजाही पर माओवादियों की निगाह थी। ऐसे में उन्हें सुनियोजित हमले के लिए पर्याप्त समय मिल गया। सच बात यह है कि यह हमला भी अपने साथ कुछ नये - पुराने सवाल लेकर आया है | इनमें पहला यह कि नक्सली हमले में क्रास फायरिंग होती है पर कोई नक्सली मारा नहीं जाता ? दूसरा सवाल यह कि जब पता है की नक्सली इलाका है तो वहां का सूचना - तंत्र इतना कमजोर क्यों कि  वे  सौ -दो सौ की संख्या में जमा होकर घात लगाते हैं, पर उनकी खबर वारदात तक नहीं मिल पाती ! ? तीसरा सवाल यह कि हमला तीन - तीन घंटे तक चलता है , पर वहां अतिरिक्त जवान क्यों नहीं पहुँचते , जबकि थाना वारदात स्थल से कोई पांच किमी पर है ? इसी क्रम में यह बात भी कि नक्सली वारदात बाद काफी देर गन,कारतूस,जूते और दीगर सामान लूटते रहे और जवान की पार्थिव देह के नीचे प्रेशर बम लगते रहे ,पर कोई अतिरिक्त फ़ोर्स नहीं पहुची ! और चौथा सवाल यह कि केद्र अलर्ट देने की बात कहता है | वैसे भी चुनाव के इस माहौल में नक्सली हमले की आशंका बढ़ जाती है , फिर भी पर्याप्त फ़ोर्स मौके पर क्यों नहीं पहुंची ? ऐसे में क्या यह सच नहीं कि अवसरवादी , ओछी और लचर राजनीति ने इस संकट को नासूर में तब्दील कर डाला है ? जब हम देश के आंतरिक दुश्मनों के ख़िलाफ़ प्रभावी , ठोस और कठोर क़दम नहीं उठा सकते , विदेशी दुश्मनों से कैसे निबट पायेंगे ?
 - डॉ . मुहम्मद अहमद 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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